Share This Article

रायपुर 27 मार्च 2026/ ETrendingIndia / बस्तर रंगमंच इतिहास , ( साभार- हेमंत कश्यप,जगदलपुर, वरिष्ठ पत्रकार ) / 625 साल से बस्तर जीवंत रंग – परंपरा को संजोए हुए है। बस्तर की संस्कृति सबको साथ लेकर चलने वाली है। जहां यह लोक जीवन , मेले – मंड़ई के लोक पर्वों में रची बसी है, वहीं परंपरा ने बाहर की सार्थक बातों को भी स्वीकृति दी है। वर्षों पहले शुरू हुई यह नाट्य विधा स्थानीय बोलियों की मिठास के साथ नाट के रूप में आज भी जीवित है।

सांस्कृतिक नवजागरण

यह समय था राजा भैराज देव का, जब बस्तर में नाटकों पर आधारित मंचन किया गया। देखा जाए तो यह एक तरह का सांस्कृतिक नवजागरण था।

रथपति राजा पुरुषोत्तम देव ने वर्ष 1408 में रथयात्रा की शुरुआत की

इसी परंपरा को रथपति राजा पुरुषोत्तम देव ने बढ़ाया। जब राजा ने 1408 में रथयात्रा की शुरुआत की तो उस दौरान होने वाले मंचन में पौराणिक कथाएं भी आईं। गोंचा और दशहरा जैसे उत्सवों में ये समाहित हो गईं। ये आगे चलकर नाट् का आधार बनी रहीं।

रंगमंच से बस्तर को मिली पहचान

नगर में रंगमंच से जुड़े अयूब खान, सुभाष पांडे, एमए रहीम, हिमांशु शेखर झा, शिवनारायण पांडे, लखेश्वर खुदराम, महेंद्र सिंह ठाकुर बताते हैं कि जब हम बस्तर के हिन्दी रंगमंच की बात करते हैं तो यह साफ़ तौर पर दिखाई देता है कि यह क्षेत्र 19 सदी में देश में विकसित हो रहे रंगमंच के साथ शुरुआती तालमेल बना रहा था। सन् 1909 में यहां की रंग- चेतना में नया विस्तार हुआ, जब बस्तर रियासत के संरक्षण में रामलीला मंडलियों को आमंत्रित किया गया। इससे सृजन के नये अंकुर फूटे।

महिला अभिनेत्री बस्तर:(१९५२ ))

पहली पार्टी बनी थी रामलीला

1914 में राजा रुद्र प्रताप देव के संरक्षण में रामलीला पार्टी का गठन हुआ। जिसका नाम उनके ही नाम पर रखा गया था। यह रामकथा का मंचन किया करती थी।

अमेच्योर थिएट्रिकल सर्विस की स्थापना

इसके बाद बाद अंग्रेज़ अफ़सरों विशेषकर टकर डब्लू बी की पहल पर अमेच्योर थिएट्रिकल सर्विस की स्थापना 1921के आसपास हुई। यह आगे चलकर आर्य बांधव थिएटर के रूप में प्रसिद्ध हुई।

इस थियेटर ने राजा हरिश्चंद्र, ख़ूबसूरत बला, अमर सिंह राठौर जैसे नाटक खेले। जगदलपुर राजबाड़ा के सामने कुंवर भवन का विशाल प्रांगण, उस समय नाटक प्रस्तुतियों का जीवंत केंद्र बनता था।

1929 में सीताराम नाटक मंडली का उदय हुआ। वीर अभिमन्यु जैसे नाटक ने, दर्शकों में वीरता और संवेदना की लहरें पैदा कर दीं। 1940 में सत्य विजय थिएट्रिकल सोसाइटी ने दानवीर कर्ण, व्याकुल भारत, श्रवण कुमार जैसे नाटकों से यहां के हिन्दी रंगमंच को गहराई दी।

बस्तर के कलाकार राजदरबार तक सीमित नहीं रहे बल्कि जन मानस में भी लोकप्रिय

यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि उस समय के अंग्रेज़ अफ़सरों ने भी इन नाट्य मंचनों को प्रोत्साहित भी किया। जिसके कारण अबूझमाड़ क्षेत्र में भी रामकथा की गूंज सुनाई दी। सबसे अच्छी बात यह थी कि बस्तर के कलाकार केवल राजदरबार तक सीमित नहीं रहे बल्कि वे जन मानस में भी बहुत लोकप्रिय हो गए थे। इनके
कई नाटकों में हास्य और व्यंग्य का ऐसा पुट जो तत्कालीन सत्ता का एक तरह से मखौल उड़ाता था।

नगर में सांस्कृतिक महाकुंभ

बस्तर के हिन्दी रंगमंच इतिहास में 21अक्टूबर 1950 का दिन मील का पत्थर साबित हुआ। जगदलपुर में मध्य प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन चतुर्दश अधिवेशन आयोजित किया गया। यह आयोजन बस्तर के लिए किसी सांस्कृतिक महाकुंभ जैसा था।

देश के हिन्दी साहित्य आकाश के नक्षत्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख़्शी, भाषा विद् क्षितिमोहन सेन, महान नाटककार डॉ रामकुमार वर्मा इसमें अवतरित थे।
महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव काकतीय इसके स्वागताध्यक्ष थे। पं सुन्दर लाल त्रिपाठी ने सम्मेलन का संयोजन किया था।
……