Share This Article मिट चुकी हाथों की लकीरें,पुतलियों पर पड़े हुए जाले,बंजर एड़ियों की दरारों कामैंने एक्स-रे निकाला है। “मशीन झूठी है”ऐसा तुम कहते हो… “तुम्हारी किस्मत ख़राब है”यह भी तुम मुझेयक़ीन दिलाते हो। मैंने अपनी आँतों का एक्स-रेगमछा बाँधकर निकाला है। मर्ज़ सबको पता है,पर तुमको तोमेरी आँख, हाथ और पैरों से काम है। तुम छाती पर आला रखकरसिर्फ धड़कनों की रफ़्तार नापते हो,पर उन धड़कनों के पीछे छपेभूख के इश्तहारकहाँ भाँपते हो? तुम्हें रीढ़ की हड्डी चाहिए सीधी,ताकि बोझ उठाने में कसर न रहे,पर जो भीतर से टूट चुकी है,उसका तुम्हारी फ़ाइलों मेंज़िक्र तक न रहे। यह जो लहू पानी बनकरतुम्हारी इमारतों की नींव में टपका है,तुम उसे सिर्फ पसीना कहते हो… तुम्हारी नज़र मेंमेरी साँसों का भी एक दाम है,क्योंकि तुमको तोमेरी आँख, हाथ और पैरों से काम है। हाँ, मशीन झूठी नहीं थी,झूठा तुम्हारी तसल्ली का नक़ाब है। तुम कहते होमेरी क़िस्मत ख़राब है, मैं कहता हूँतुम्हारी नीयत का यह एक्स-रेबेमिसाल है। कहो,क्या तुम वही होजो इंसान को नहीं,उसकी उपयोगिता को पहचानते हो?-मनोज मौर्य, मुंबई रायपुर,26 जून 2026/ ETrendingIndia / मनोज मौर्य, मुंबई रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है…. Share This Article Post navigation ॥ कल्पना और भविष्य ॥ Box Office Blast : ‘वेलकम टू द जंगल’ ने ‘भूत बंगला’ को छोड़ा पीछे…ओपनिंग डे पर छापे करोड़ों…वर्ल्डवाइड कमाई ने चौंकाया