Share This Article कल तक जो मेरे आदर्श थे,आज वहीभ्रष्टता के आदर्श बन बैठे हैं। किसे गुरु कहें,किसे नेता मानें-सब अपने-अपने ईमाननीलाम कर बैठे हैं। जो कल तकमेरी राह की मशाल थे,आज उसी उजाले सेअपना घर चमका रहे हैं। कुतर्कों के बाज़ार मेंविवेक औने-पौने बिक रहा है,चेहरों पर मुखौटे हैं,और आईने भी दाग़दार हैं। जिनसे दिशा माँगी थी,वही रास्ते भटकाने लगे। अब बाहर के सारे बुतएक-एक कर टूट रहे हैं,सहारे देने वाले हाथ हीदीवारें बनकर छूट रहे हैं। फिर किस पर यक़ीन करें? शायद अबअपने भीतर लौटना होगा। -मनोज मौर्य, मुंबई रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है…. Share This Article Post navigation Hareli Festival 2026 : CM हाउस में हरेली का जश्न..! तस्वीरों में देखें गेड़ी दौड़, रहचुली और लोक संस्कृति का पूरा नजारा बंटवारा 1947 के लिए एडवांस बुकिंग शुरू, सिनेमाघरों में 14 अगस्त को रिलीज होगी फिल्म