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कल तक जो मेरे आदर्श थे,
आज वही
भ्रष्टता के आदर्श बन बैठे हैं।

किसे गुरु कहें,
किसे नेता मानें-
सब अपने-अपने ईमान
नीलाम कर बैठे हैं।

जो कल तक
मेरी राह की मशाल थे,
आज उसी उजाले से
अपना घर चमका रहे हैं।

कुतर्कों के बाज़ार में
विवेक औने-पौने बिक रहा है,
चेहरों पर मुखौटे हैं,
और आईने भी दाग़दार हैं।

जिनसे दिशा माँगी थी,
वही रास्ते भटकाने लगे।

अब बाहर के सारे बुत
एक-एक कर टूट रहे हैं,
सहारे देने वाले हाथ ही
दीवारें बनकर छूट रहे हैं।

फिर किस पर यक़ीन करें?

शायद अब
अपने भीतर लौटना होगा।

-मनोज मौर्य, मुंबई

रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है….


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