Sipahi Bahadur Sarkar: Sehore also played a significant role in the freedom struggle...! Sipahi Bahadur Sarkar: An example of Hindu-Muslim unity.Sipahi Bahadur Sarkar
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रघुवर दयाल गोहिया सीहोर। Sipahi Bahadur Sarkar : ये तो सब जानते हैं कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिए सन 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का आगाज़ हो गया था। इसकी बानगी भोपाल रियासत के महत्वपूर्ण जिला मुख्यालय सीहोर में भी देखने को मिली थी। इसके अलावा सन 1824 में भी यहां एक बड़ी लड़ाई दशहरा वाले बाग में नरसिंहगढ़ रियासत के राजकुमार कुंवर चैन सिंह और उनके साथियों ने लड़ी थी। जिसमें करीब 45 देशभक्त शहीद हुए थे। इनमें कुंवर चैन सिंह के विश्वस्त साथी हिम्मत खां और बहादुर खां के नाम प्रमुख हैं। इन दोनों देशभक्त शहीदों की कब्र भी कुंवर चैन सिंह की छत्री के ठीक सामने बनी हुई हैं।

जैसे वे आज भी अपने राजकुंवर की हिफाज़त में मुस्तैद हों। अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ सीहोर में ही महावीर कोठ और वली शाह के नेतृत्व में सिपाही बहादुर सरकार की स्थापना की गई थी। ये दोनों भोपाल रियासत की उस फौज के सिपाही थे जो पॉलिटिकल एजेंट के नियंत्रण वाली रेजीमेंट में पदस्थ थे। इसमें एक हजार सैनिक शामिल थे जिन्हें भोपाल रियासत की ओर से तनख्वाह दी जाती थी। यह फौज सीहोर के पलटन एरिया, इंग्लिशपुरा और कस्बा के सिपाही पुरा मोहल्ला में रहती थी। फौज में हिंदू और मुसलमान एक साथ रहते थे और उनमें अंग्रेजों के साथ साथ भोपाल नवाब के खिलाफ नफ़रत फैल गई थी। इसकी वजह यह थी कि भोपाल नवाब अंग्रेज परस्त थी और एक अफ़वाह फैल गई थी कि जो कारतूस सैनिकों को दिए जा रहे थे उनमें गाय और सुअर की हड्डियों का चूरा व चर्बी मिलाई जा रही थी। जिससे हिंदू और मुसलमान सैनिकों का धर्म भ्रष्ट हो रहा था। साथ ही एक अफवाह यह भी फैली हुई थी कि भोपाल नवाब ने ईसाई धर्म कुबूल कर लिया है।


केसरिया और हरे रंग के थे सिपाही बहादुर सरकार के झंडे

सिपाही बहादुर सरकार के दो झंडे थे। इनमें से एक का नाम निशाने महावीरी (भगवा रंग) और दूसरे झंडे का नाम निशाने मोहम्मदी (हरा रंग) था। यह पहली स्वतंत्र सरकार थी जो अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट की नाक के ठीक नीचे डंके की चोट पर स्थापित की गई थी। 8 अगस्त 1857 को इस सरकार का प्रशासन चलाने के लिए महावीरी काउंसिल की स्थापना की गई थी जिसका मुखिया महावीर कोठ को बनाया गया था। इसी समय इस सरकार की दो अदालतें भी गठित की गई जिनके मुखिया वली शाह और महावीर कोठ थे। बागियों को प्रशिक्षित करने के लिए वली शाह ने प्रति दिन हाथ से लिखे बुलेटिन भी जारी किए जो एक तरह के अखबार ही माने जा सकते हैं। जिन्हें फौजी आपस में ग्रुप बनाकर पढ़ते थे। इस बगावत को रोकने के लिये कई प्रयास किए गए जो सफल नहीं हुए।

आखिरकार 1 सितंबर 1857 को बेगम भोपाल के आदेश पर सीहोर के 137 बागियों को फ़ौज की नौकरी से निकाल दिया गया और भोपाल रियासत की सीमा से बाहर चले जाने का फरमान सुनाया गया। शुजाअत खां और उनके बेटे को सीहोर में दी गई थी फांसी आज़ादी के आंदोलन के एक महत्वपूर्ण किरदार शुजाअत खां और उनके पुत्र सरफराज खां को सीहोर में ही फांसी की सजा दी गई। दरअसल बैरसिया में भी विद्रोह अपने चरम पर था। इस दौरान 26 सितंबर 1857 में भोपाल की फौज ने सूबेदार भवानी सिंह की कमान में बैरसिया पर हमला किया। जिसमें शुजाअत खां हार गए। इसके बाद वह भागकर कुरावर आ गए।

29 अक्टूबर 1857 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 25 नवंबर को अहमदपुर के रास्ते से कड़े फौजी पहरे में सीहोर लाया गया। यहां उन्हें और उनके पुत्र सरफ़राज़ खां को जेल में बंद कर दिया गया। 4 जनवरी 1858 का सूरज उनकी मौत का पैगाम लेकर आया। दोनों पिता पुत्र को सूर्योदय से पहले जेल से निकाला गया और कड़े पहरे में ईदगाह के करीब ले जाया गया। इसी स्थान पर एक महुआ के पेड़ के नीचे दोनों देशभक्त पिता पुत्र को फ़ांसी पर लटका दिया गया। फिर इन दोनों को सफाई करने वालों की मदद से शायद पहले से तैयार की गई कब्र में एक साथ दफ़ना दिया गया। भोपाल कॉन्टिनजेन्ट के बागी सिपाही कई दिनों से सीहोर जेल में कैद थे। जिन्हें सजा-ए-मौत का फैसला दिया जा चुका था। 8 जनवरी 1858 को जब जनरल रोज अपनी फौज के साथ सीहोर आया तो उसने तुरंत बागियों को मौत की सजा देने का फैसला सुना दिया।

परिणाम स्वरूप 14 जनवरी 1858 को सीवन नदी के किनारे एक मैदान में 356 बागियों को छोटी छोटी टुकड़ियों में खड़ा कर दिया गया और गोलियों से भून डाला गया। उस दिन देशभक्त शहीदों का इतना खून बहा की सीवन का पानी भी लाल हो गया और पवित्र नदी शोक में अपना सिर धुनती रही। इस घटना का जिक्र किताब हयाते सिकंदरी, भोपाल स्टेट गजेटियर 1907, 1857-58 के गदर में मध्य भारत के हालात और देहली गजट 15 जनवरी 1858 में किया गया है। बाद के समय में महावीर कोठ, वली शाह, फाजिल मोहम्मद आदि को भी गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई।

इस प्रकार 6 अगस्त 1857 को सीहोर में स्थापित की गई सिपाही बहादुर सरकार 31 जनवरी 1858 में उस समय समाप्त हो गई जब फाजिल मोहम्मद खां को राहतगढ़ किले के दरवाजे पर फ़ांसी देकर लटका दिया गया। इस लेख में अधिकतर संदर्भ स्वराज संस्थान संचालनालय संस्कृति विभाग मध्यप्रदेश शासन की किताब सिपाही बहादुर से साभार लिया गया है।

आजादी के आंदोलन में इन वीरांगनाओं का भी योगदान हमारा देश तो 15 अगस्त1947 को आजाद हो गया था लेकिन अब भी भोपाल रियासत का विलय नहीं हुआ था। इसके लिए भी सीहोर की सरजमीं से जो आंदोलन चलाया गया था उसमें हमारी इन महान वीरांगनाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनमें कस्बा निवासी श्रीमती रुक्मणी देवी व्यास, श्रीमती धनेश्वरी देवी चतुर्वेदी और श्रीमती गिरजा बाई व्यास (गढ़ीपुरा हरदा) के नाम उल्लेखनीय हैं। ये सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहीं है और विलीनीकरण आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है। श्रीमती चतुर्वेदी और श्रीमती रुक्मणी देवी ने तो पुरानी निजामत की बिल्डिंग पर 13 जनवरी 1949 में तिरंगा झंडा भी फहराया था। इन दोनों को 20-20 दिन तक नजरबंद भी किया गया था।


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