Share This Article रायपुर, 31 अगस्त 2026/ ETrendingIndia / बस्तर में डंकनी और शंखनी नदी के संगम पर स्थित मां दंतेश्वरी का मंदिर 5000 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह मंदिर अब केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित शिलालेख के अनुसार लगभग 708 साल पहले वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के अन्नम देव ने इस शक्तिपीठ का जीर्णोद्धार कराया था। 52 शक्तिपीठों में एक पौराणिक कथा है कि भगवान शंकर के मना करने के बावजूद माता सती अपने पिता दक्ष के घर आयोजित यज्ञ समारोह में गई। जहां भगवान शंकर और सती का अपमान हुआ। पिता द्वारा इस अपमान से व्यथित सती यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी आहुति दे दी। भगवान शंकर माता सती की काया लेकर तांडव करने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को विच्छेद कर बिखेर दिया। जहां-जहां माता के अंग गिरे। वह स्थल शक्तिपीठ के नाम से चर्चित हुए। यहां गिरे माता के अधोदंत माता सती का अधोदंत दंतेवला (अब दंतेवाड़ा) में संगम में गिरा इसलिए यह स्थल दंतेश्वरी शक्तिपीठ के नाम से विख्यात है। इस बातों की पुष्टि गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित किताब शक्तिपीठ में भी की गई है। यह बताना भी जरूरी है कि यह स्थल आठ भैरव भाइयों का निवास स्थल भी है। नदी के किनारे यह भैरव भाई निवास करते हैं। डाकिनी और शाकिनी दो यक्षणियां हैं। इनके नाम पर ही यहां नदियों का नाम डंकनी और शंखनी है। दुनिया में जितने भी शक्तिपीठ है। वहां चैत्र और क्वांर महीने में दो नवरात्रियां मनाई जाती हैं, किंतु दंतेश्वरी शक्तिपीठ में हर साल दो नहीं अपितु तीन नवरात्रियां मनाई जाती है। तीसरी नवरात्रि फागुन महीने में आखेट नवरात्र के रूप में मनाई जाती है। जिसे यहां का जन मानस फागुन मड़ई कहता है। Share This Article Post navigation परिव्राजक सत्र का विदाई समारोह : साधना से सेवा और संस्कारों की ओर बढ़ें साधक – आदरणीय योगेंद्र गिरी जी पेरिस में भव्य स्वामीनारायण मंदिर का लोकार्पण…! PM मोदी बोले – यह भारत-फ्रांस रिश्तों का नया युग स्तंभ…