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 रायपुर, 07 अक्टूबर 2026 / ETrendingIndia / फ्रांस में सितंबर 2026 में कुछ स्कूलों से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन अब देशव्यापी विरोध का रूप ले चुका है। बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं, पर्याप्त शिक्षकों, अधिक सरकारी वित्तीय सहायता और सुरक्षित वातावरण की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब पुलिस कार्रवाई, सामाजिक असमानता और युवाओं के भविष्य से जुड़े व्यापक मुद्दों तक पहुंच गया है। 6 अक्टूबर को देशभर में हुए प्रदर्शनों में सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 2.66 लाख लोग शामिल हुए, जिनमें लगभग 56 हजार प्रदर्शनकारी अकेले पेरिस में थे। इस दौरान 6,500 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की बताई जा रही है।
आंदोलन की शुरुआत सितंबर के मध्य में पेरिस क्षेत्र के एक स्कूल से हुई थी। छात्रों की शुरुआती शिकायतें मुख्य रूप से शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी थीं। उनका कहना था कि स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके अनुरूप शिक्षक, कक्षाएं और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।


कई स्कूलों में जर्जर इमारतें, भीड़भाड़ वाली कक्षाएं और शिक्षकों की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया और ‘पारकूरसुपÓ जैसी व्यवस्था को लेकर भी असंतोष जताया। शुरुआत में विरोध प्रदर्शन स्थानीय स्तर तक सीमित थे, लेकिन कुछ ही दिनों में दूसरे स्कूल भी इसमें शामिल हो गए। बाद में विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने भी आंदोलन का समर्थन करना शुरू कर दिया।


प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग शिक्षा व्यवस्था में अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की है। उनका कहना है कि यदि सरकार देश के भविष्य के निर्माण की बात करती है तो उसे शिक्षा क्षेत्र में पर्याप्त निवेश भी करना चाहिए। छात्रों की मांगों में स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना, शिक्षकों के रिक्त पदों को जल्द भरना, कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या कम करना, जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और स्वास्थ्य एवं छात्र सहायता सुविधाओं में सुधार शामिल हैं।


इसके अलावा छात्र शिक्षा व्यवस्था के लिए अधिक सरकारी वित्तीय सहायता और अपनी समस्याओं पर सरकार के साथ सीधे संवाद की मांग कर रहे हैं। कई छात्रों का कहना है कि शिक्षा में असमानता का सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ रहा है। गरीब और कामकाजी वर्ग वाले इलाकों में रहने वाले छात्रों के बीच यह चिंता अधिक दिखाई दे रही है।


आंदोलन के दौरान स्कूलों की नाकेबंदी विरोध का प्रमुख तरीका रही है। कई स्थानों पर छात्रों ने स्कूलों के प्रवेश द्वारों पर अवरोधक लगाए और कक्षाओं का बहिष्कार किया। इसके चलते कई संस्थानों में पढ़ाई प्रभावित हुई और कुछ स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
आंदोलन के विस्तार के साथ यह केवल पेरिस तक सीमित नहीं रहा। लेंस, लिली, टूलूज, सेंट-ओएन-ल’ओमोन समेत कई अन्य शहरों में भी प्रदर्शन हुए। 6 अक्टूबर के देशव्यापी प्रदर्शनों में ट्रेड यूनियनों और शिक्षकों के संगठनों ने भी छात्रों के समर्थन में भाग लिया। इससे छात्रों का शिक्षा संबंधी मुद्दा धीरे-धीरे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विरोध का रूप लेने लगा।


आंदोलन का सबसे संवेदनशील पहलू पुलिस कार्रवाई को लेकर पैदा हुआ विवाद है। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और दंगा-रोधी पुलिस के बीच झड़पें हुईं। पुलिस ने आंसू गैस और अन्य भीड़ नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया। सरकार का कहना है कि कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गए और पुलिसकर्मियों पर पत्थर, आतिशबाजी तथा अन्य वस्तुएं फेंकी गईं।


दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। इन विवादों के बीच फ्रांस की पुलिस निरीक्षण संस्था ने कई मामलों की जांच शुरू की है।


5 अक्टूबर को लेंस शहर में एक 15 वर्षीय छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके हाथ में विस्फोट होने के बाद हथेली और हाथ का एक हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। घटना की परिस्थितियों की जांच जारी है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि छात्र ने स्वयं कोई ग्रेनेड उठाया था या वह उसके ऊपर आकर गिरा था। मामले की जांच पुलिस निरीक्षण संस्था को सौंपी गई है।


इस घटना ने प्रदर्शनकारियों के बीच पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण के तरीकों को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
इससे पहले सेंट-ओएन-ल’ओमोन में 14 वर्षीय एडेन भी गंभीर रूप से घायल हुआ था। रिपोर्टों के अनुसार, आंसू गैस का ग्रेनेड उसके चेहरे पर लगा, जिससे उसके जबड़े में दो जगह फ्रैक्चर हुआ और कई दांत टूट गए। फ्रांसीसी मीडिया के मुताबिक, इस मामले में पुलिस अधिकारी द्वारा ग्रेनेड प्रक्षेपक के इस्तेमाल को लेकर जांच शुरू की गई है। आरोप है कि ग्रेनेड सीधे दिशा में दागा गया था, जबकि सुरक्षा नियमों के तहत इस तरह की कार्रवाई में विशेष सावधानी बरतने के निर्देश हैं।


रिपोर्टों के अनुसार, आंदोलन के दौरान घायल और हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या लगातार बदल रही है। 5 अक्टूबर तक प्रधानमंत्री कार्यालय के हवाले से सामने आए आंकड़ों में 215 छात्रों, 85 शिक्षा कर्मचारियों और 715 पुलिसकर्मियों तथा जेंडार्म के घायल होने की जानकारी दी गई थी। वहीं, 6 अक्टूबर तक गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या 6,500 से अधिक बताई गई।


हालांकि, सभी चोटों को पुलिस कार्रवाई से जोडऩा उचित नहीं होगा। फ्रांसीसी सरकार का कहना है कि छात्रों की कुछ चोटें दुर्घटनाओं या अन्य प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों के कारण भी हुई हैं। वहीं, पुलिस कार्रवाई से जुड़ी गंभीर घटनाओं की अलग-अलग जांच जारी है।


फ्रांस के इस आंदोलन की खासियत यह है कि छात्रों की शिकायतें केवल स्कूलों की इमारतों या शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं हैं। कई युवा शिक्षा, रोजगार, आर्थिक असमानता, सामाजिक अवसरों और राजनीतिक व्यवस्था को लेकर अपने भविष्य के प्रति असुरक्षा व्यक्त कर रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भविष्य में रोजगार की संभावनाओं जैसे मुद्दों को भी अपने व्यापक असंतोष से जोड़ा है।


इसी कारण यह आंदोलन केवल ‘स्कूलों के लिए अधिक धनÓ की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यह युवाओं की उन चिंताओं का मंच बनता जा रहा है, जिनमें वे सरकार से अपने भविष्य और अवसरों को लेकर अधिक जवाबदेही चाहते हैं।


फ्रांस सरकार के सामने अब एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और दूसरी ओर छात्रों की वास्तविक शिकायतों का समाधान करने की चुनौती है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू की सरकार ने छात्रों से संवाद और उनकी समस्याओं को सुनने पर जोर दिया है। शिक्षा मंत्रालय ने छात्रों की शिकायतें दर्ज करने के लिए एक मंच शुरू करने और स्कूलों की समस्याओं पर कार्रवाई करने की बात कही है।


हालांकि, प्रदर्शनकारी केवल आश्वासन के बजाय ठोस बदलाव की मांग कर रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव से कुछ महीने पहले युवाओं का इतना बड़ा आंदोलन सरकार पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ा सकता है। विपक्षी दल पुलिस कार्रवाई और शिक्षा नीति को लेकर सरकार से सवाल कर रहे हैं।
फिलहाल आंदोलन पूरी तरह खत्म होने के संकेत नहीं हैं। 6 अक्टूबर के बड़े प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि छात्रों के मुद्दों को शिक्षकों और ट्रेड यूनियनों का भी समर्थन मिल रहा है। अब आंदोलन का स्वरूप इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार छात्रों की मांगों पर कितने ठोस कदम उठाती है और पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामलों की जांच में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।


फ्रांस में शुरू हुआ यह छात्र आंदोलन शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं से पैदा हुआ, लेकिन अब इसमें पुलिस कार्रवाई, सामाजिक असमानता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे भी जुड़ गए हैं। ऐसे में यह केवल स्कूलों में बेहतर सुविधाओं की मांग का आंदोलन नहीं रह गया है, बल्कि फ्रांस की नई पीढ़ी की शिक्षा, रोजगार और भविष्य को लेकर बढ़ती चिंताओं की अभिव्यक्ति बनता दिखाई दे रहा है।


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