Share This Article नई दिल्ली, 15 अक्टूबर 2026। Navratri 2026: शारदीय नवरात्र के दौरान देशभर में मां दुर्गा की पूजा अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ की जाती है। दक्षिण भारत में इस पर्व का खास आकर्षण ‘गोलू गुड़िया’ की परंपरा है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में घरों और मंदिरों में रंग-बिरंगी गुड़ियों को सीढ़ीनुमा मंचों पर सजाया जाता है। इन झांकियों में देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं, ग्रामीण जीवन और भारतीय संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिलती है। अलग-अलग राज्यों में अलग नाम से प्रसिद्ध है गोलू परंपरा दक्षिण भारत में गोलू उत्सव को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। तमिलनाडु में इसे ‘बोम्मई गोलू’, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में ‘बोम्माला कोलुवु’ तथा कर्नाटक में ‘बॉम्बे हब्बा’ कहा जाता है। इस परंपरा के लिए परिवार कई दिनों पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं। गुड़ियों को विषय के अनुसार सजाकर धार्मिक कथाओं और सामाजिक जीवन से जुड़े दृश्य तैयार किए जाते हैं। देवी दुर्गा की विजय से जुड़ा है गोलू उत्सव गोलू उत्सव को बुराई पर अच्छाई की जीत और देवी दुर्गा की शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध धर्म और शक्ति की विजय का प्रतीक है। इस परंपरा की ऐतिहासिक जड़ें दक्षिण भारत के पुराने राजदरबारों और दशहरा उत्सवों से भी जुड़ी मानी जाती हैं। विजयनगर साम्राज्य और मैसूर के शाही परिवारों ने इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुड़ियों के जरिए दिखाई जाती है रामायण और महाभारत की कहानी गोलू की सजावट में भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, भगवान शिव और श्रीकृष्ण सहित अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी जाती हैं। इसके साथ रामायण और महाभारत के प्रसंगों को भी गुड़ियों के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। राम सेतु निर्माण, सीता कल्याण, रावण वध और भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक जैसे दृश्य इन झांकियों का हिस्सा बन सकते हैं। धार्मिक प्रसंगों के अलावा गांव के बाजार, फल-सब्जियों की दुकानें, खेती-किसानी, घरेलू कामकाज और राजा-रानी की आकृतियां भी सजाई जाती हैं। इस तरह गोलू धार्मिक आस्था के साथ-साथ कला, लोकजीवन और पारिवारिक परंपराओं को संजोने का माध्यम बन जाता है। 3, 5, 7 या 9 सीढ़ियों पर सजाई जाती हैं गुड़ियां गोलू सजाने के लिए लकड़ी या अन्य सामग्री से सीढ़ीनुमा मंच तैयार किया जाता है। आमतौर पर इसमें 3, 5, 7, 9 या 11 सीढ़ियां होती हैं। सीढ़ियों को कपड़े से ढककर रोशनी और सजावटी वस्तुओं से आकर्षक बनाया जाता है। इसके बाद गुड़ियों को उनकी विषयवस्तु के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है, जिससे पूरी सजावट एक कहानी की तरह दिखाई देती है। मरापाची गुड़िया का है विशेष महत्व गोलू की परंपरा में ‘मरापाची बोम्मई’ का विशेष स्थान है। ये पारंपरिक लकड़ी की गुड़ियां आमतौर पर जोड़े में रखी जाती हैं। कई परिवारों में इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में सौंपा जाता है। इन्हें शुभता और पारिवारिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र के दौरान परिवार अपने रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों को गोलू देखने के लिए आमंत्रित करते हैं। घरों में भजन, श्लोक-पाठ, उपहारों का आदान-प्रदान और सात्विक भोजन की व्यवस्था होती है। उत्सव समाप्त होने के बाद गुड़ियों को सावधानी से सुरक्षित रख दिया जाता है, ताकि अगले वर्ष फिर श्रद्धा और उत्साह के साथ गोलू सजाया जा सके। Share This Article Post navigation दृश्यम 3 से अजय देवगन ने रचा इतिहास, 3 दशक से लंबे करियर में दर्ज की पहली 500 करोड़ी फिल्म