Share This Article नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026। International Snow Leopard Day 2026 : हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों में रहने वाला हिम तेंदुआ दुनिया के सबसे दुर्लभ और आकर्षक वन्यजीवों में शामिल है। अपनी धूसर-सफेद खाल, काले धब्बों और लंबी पूंछ के कारण यह बर्फीले वातावरण में आसानी से छिप जाता है। इसी वजह से इसे ‘पहाड़ों का भूत’ भी कहा जाता है। हर वर्ष 23 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस प्रजाति और इसके पर्वतीय आवासों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। भारत में किए गए पहले व्यवस्थित वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, देश में हिम तेंदुओं की अनुमानित संख्या 718 है। 23 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस? हिम तेंदुए का वैज्ञानिक नाम Panthera uncia है। यह एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है और अपने पारिस्थितिकी तंत्र में शीर्ष शिकारी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अफगानिस्तान, भूटान, चीन, भारत, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित 12 देशों के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2024 में 23 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस घोषित किया। इसका उद्देश्य हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना तथा जैव विविधता के नुकसान को रोकने के प्रयासों को मजबूत करना है। इस दिवस की शुरुआत से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना 2013 में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुई थी। वहां हिम तेंदुए की मौजूदगी वाले 12 देशों ने इसके संरक्षण के लिए बिश्केक घोषणा को अपनाया और ग्लोबल स्नो लेपर्ड एंड इकोसिस्टम प्रोटेक्शन प्रोग्राम (GSLEP) को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। भारत में कहां पाए जाते हैं हिम तेंदुए? भारत में हिम तेंदुए मुख्य रूप से लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इनका प्राकृतिक आवास ठंडे, पथरीले और दुर्गम पहाड़ी इलाके हैं, जहां ये जंगली बकरियों और भेड़ों जैसे शिकार पर निर्भर रहते हैं। हिम तेंदुए की शारीरिक बनावट उसे कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में जीवित रहने में मदद करती है। इसके मजबूत पिछले पैर लंबी छलांग लगाने में सहायक होते हैं, जबकि लंबी और घनी पूंछ खड़ी ढलानों पर संतुलन बनाए रखने तथा ठंड में शरीर को ढकने में मदद करती है। भारत में 718 हिम तेंदुए, लद्दाख सबसे आगे भारत सरकार ने 2019 से 2023 के बीच देशव्यापी हिम तेंदुआ गणना कराई थी। इस आकलन को स्नो लेपर्ड पॉपुलेशन असेसमेंट इन इंडिया (SPAI) नाम दिया गया। इसके निष्कर्ष 30 जनवरी 2024 को जारी किए गए थे। यह देश में हिम तेंदुओं की संख्या का पहला व्यवस्थित और वैज्ञानिक आकलन था। आकलन में लगभग 1.20 लाख वर्ग किलोमीटर के उच्च पर्वतीय आवास को शामिल किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हिम तेंदुओं की अनुमानित संख्या 718 थी। राज्य/केंद्र शासित प्रदेशअनुमानित संख्यालद्दाख477उत्तराखंड124हिमाचल प्रदेश51अरुणाचल प्रदेश36सिक्किम21जम्मू-कश्मीर9कुल718 11 दिसंबर 2025 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, गणना के दौरान सर्वेक्षण टीमों ने 13,450 किलोमीटर के मार्ग पर पैदल सर्वेक्षण किया और 1,971 स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए। लगभग 1,80,000 ट्रैप नाइट्स के दौरान 241 अलग-अलग हिम तेंदुओं की पहचान की गई। इस कार्य का समन्वय भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून ने संबंधित राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और संरक्षण भागीदारों के सहयोग से किया। इसके बाद हिम तेंदुए और उसके आवास के संरक्षण को मजबूत करने के लिए SPAI 2.0 की पहल भी शुरू की गई। हिम तेंदुए के सामने कौन-कौन से खतरे हैं? हिम तेंदुए का अस्तित्व कई प्राकृतिक और मानवीय चुनौतियों से प्रभावित हो रहा है। इसके संरक्षण के लिए इन खतरों को समझना जरूरी है। अवैध शिकार: इसकी खाल और शरीर के अन्य अंगों के लिए अवैध शिकार किया जाता है। प्राकृतिक आवास का नुकसान: सड़क निर्माण, बुनियादी ढांचे के विस्तार और अनियंत्रित पर्यटन से इसके आवास प्रभावित हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन: तापमान बढ़ने और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव से इसके आवास और शिकार की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। शिकार की कमी: जंगली भेड़-बकरियों जैसे प्राकृतिक शिकार की संख्या घटने से भोजन की उपलब्धता कम हो सकती है। मानव-वन्यजीव संघर्ष: जब हिम तेंदुआ पालतू पशुओं का शिकार करता है, तो स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए भारत सरकार के प्रयास भारत में हिम तेंदुए को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसके संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड और केंद्र प्रायोजित वन्यजीव आवास विकास योजना के अंतर्गत प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। लद्दाख स्थित हेमिस राष्ट्रीय उद्यान हिम तेंदुए के महत्वपूर्ण आवासों में शामिल है। इसके अलावा, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में संरक्षित इलाकों के प्रबंधन, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर भी जोर दिया जा रहा है। सिक्योर हिमालय पहल का उद्देश्य उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका को मजबूत करना है। हिम तेंदुओं की संख्या के वैज्ञानिक आकलन से संरक्षण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलती है। दुनिया के 12 देश मिलकर कर रहे हैं संरक्षण हिम तेंदुए का संरक्षण किसी एक देश तक सीमित नहीं है। इसके प्राकृतिक आवास कई देशों में फैले हुए हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण है। 2013 में शुरू किया गया ग्लोबल स्नो लेपर्ड एंड इकोसिस्टम प्रोटेक्शन प्रोग्राम (GSLEP) हिम तेंदुए और उसके पर्वतीय आवासों के संरक्षण के लिए काम करता है। इसके अलावा, नेपाल की हिम तेंदुआ संरक्षण कार्ययोजना 2024–2030 और भूटान की स्नो लेपर्ड कंजर्वेशन एक्शन प्लान 2024–2034 जैसी पहलें भी इस प्रजाति की रक्षा के लिए बनाई गई हैं। भारत और रूस के बीच अगस्त 2026 में आयोजित हिम तेंदुआ अध्ययन एवं संरक्षण संबंधी गोलमेज सम्मेलन भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में एक प्रयास था। आम लोग कैसे कर सकते हैं मदद? हिम तेंदुए के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, पर्यटकों और आम नागरिकों की भी अहम भूमिका है। इसके लिए कुछ जरूरी कदम अपनाए जा सकते हैं: वन्यजीवों के अवैध शिकार और तस्करी की सूचना संबंधित अधिकारियों को दें। हिमालयी क्षेत्रों में यात्रा करते समय वन्यजीवों से सुरक्षित दूरी बनाए रखें और स्थानीय नियमों का पालन करें। प्राकृतिक आवासों में कचरा और प्लास्टिक न फैलाएं। स्थानीय समुदायों की भागीदारी वाले जिम्मेदार इको-टूरिज्म को प्रोत्साहित करें। हिम तेंदुए और उसके पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाएं। हिम तेंदुआ केवल एक दुर्लभ वन्यजीव नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक है। इसके संरक्षण से पर्वतीय जैव विविधता, प्राकृतिक संतुलन और स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी लाभ मिलता है। अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस हमें याद दिलाता है कि इस अनमोल प्राकृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। Share This Article Post navigation Varanasi Air Show 2026 : गंगा की लहरों पर दिखेगा भारतीय शौर्य… नमामि गंगे ने गंगा आरती कर किया अभिनंदन