रायपुर, 06 अगस्त 2026/ ETrendingIndia / (आरएनएस)। चांदीपुरा वायरस (सीएचपीवी) संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार ने गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (एनजेओआरटी) तैनात किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने बताया कि यह कदम वायरस के संक्रमण, उसके प्रसार, नैदानिक प्रभाव और रोकथाम संबंधी वैज्ञानिक जानकारी को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उठाया गया है। इसके साथ ही देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थानों द्वारा बहु-संस्थागत स्तर पर व्यापक वैज्ञानिक जांच भी तेज कर दी गई है।
मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) तथा पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम राज्य सरकारों के साथ मिलकर प्रकोप की जांच, महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययन, रोगियों के उपचार प्रबंधन, प्रयोगशाला समन्वय, वाहक (वेक्टर) निगरानी और जनस्वास्थ्य उपायों के क्रियान्वयन में सहयोग करेगी। एनसीडीसी के सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकालीन संचालन केंद्र (पीएचईओसी) को भी इस अभियान के समर्थन के लिए सक्रिय कर दिया गया है।
कई राष्ट्रीय संस्थान कर रहे संयुक्त अनुसंधान
स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि इस समय चांदीपुरा वायरस पर अब तक की सबसे व्यापक वैज्ञानिक जांच चल रही है। इसमें चेन्नई स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान, पुदुचेरी स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय वेक्टर नियंत्रण अनुसंधान संस्थान, पुणे स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान, हैदराबाद स्थित आईसीएमआर-राष्ट्रीय पूर्व-नैदानिक अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान एवं रोग सूचना विज्ञान संस्थान तथा गुजरात राज्य स्वास्थ्य विभाग संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं।
इन संस्थानों के विशेषज्ञ महामारी विज्ञान, विषाणु विज्ञान, कीट विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान और प्रयोगशाला निदान के माध्यम से यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि चांदीपुरा वायरस का संक्रमण सामान्य बुखार से लेकर तीव्र मस्तिष्कशोथ सिंड्रोम (एईएस) तक किस प्रकार विकसित होता है तथा इसे नियंत्रित करने के लिए प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति कैसे विकसित की जाए।
सक्रिय निगरानी और सीरो सर्वेक्षण शुरू
प्रभावित जिलों में तीव्र बुखार और एईएस के मरीजों की सक्रिय निगरानी बढ़ा दी गई है। इसके साथ ही समुदाय स्तर पर सीरो सर्वेक्षण भी किए जा रहे हैं, ताकि बिना लक्षण वाले संक्रमणों की पहचान हो सके और वायरस के वास्तविक प्रसार का आकलन किया जा सके। वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं बेहतर जांच तकनीकों और रोग के अध्ययन के लिए उन्नत पशु मॉडल विकसित करने पर भी कार्य कर रही हैं।
वायरस के वाहक की पहचान पर शोध जारी
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वैज्ञानिक यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि वायरस का प्रमुख वाहक कौन है। अब तक सैंडफ्लाई को इसका प्रमुख वाहक माना जाता रहा है, लेकिन शोधकर्ता यह भी जांच रहे हैं कि क्या मच्छर, किलनी या अन्य सूक्ष्म कीट भी इसके प्रसार में भूमिका निभाते हैं। प्रभावित क्षेत्रों से बड़ी संख्या में एकत्र किए गए वाहक नमूनों का प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा रहा है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक जांच पूरी होने से पहले किसी एक वाहक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
पशुओं में संक्रमण की भी जांच
वन हेल्थ दृष्टिकोण के तहत पशुओं में संक्रमण की संभावना का भी अध्ययन किया जा रहा है। गाय, भैंस और बकरियों सहित विभिन्न पालतू पशुओं के रक्त और दूध के नमूने जांच के लिए एकत्र किए गए हैं। अब तक लगभग 70 पशुओं के रक्त नमूनों का परीक्षण किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वायरस पशुओं में भी मौजूद है या नहीं। मंत्रालय ने कहा कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।
जीनोम अनुक्रमण से वायरस के बदलावों की पड़ताल
वर्तमान प्रकोप के दौरान मिले वायरस के नमूनों का गुजरात जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र (जीबीआरसी) में संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण किया जा रहा है। प्रारंभिक जांच में कुछ मामूली आनुवंशिक परिवर्तन मिले हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह जानने के लिए विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है कि वर्तमान वायरस पहले के प्रकोपों से जुड़े स्वरूपों से कितना अलग है।
2024 के अनुभव का भी लिया जा रहा लाभ
मंत्रालय ने बताया कि वर्तमान जांच में वर्ष 2024 में गुजरात में हुए चांदीपुरा वायरस प्रकोप से मिले अनुभवों का भी उपयोग किया जा रहा है। उस समय सैंडफ्लाई सहित कई संभावित वाहकों के नमूनों की जांच की गई थी, लेकिन किसी भी नमूने में वायरस की निर्णायक पुष्टि नहीं हुई थी। इसी कारण इस बार वैज्ञानिक जांच का दायरा और व्यापक रखा गया है।
एईएस निगरानी नेटवर्क से मिलेगा सहयोग
देशभर के 15 तृतीयक अस्पतालों में संचालित तीव्र मस्तिष्कशोथ सिंड्रोम (एईएस) अस्पताल आधारित निगरानी नेटवर्क भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल, सीरोलॉजिकल और आणविक जांच तथा अगली पीढ़ी के जीनोम अनुक्रमण के माध्यम से यह नेटवर्क प्रकोप की समय पर पहचान, रोग के कारणों की बेहतर समझ और प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्रवाई के लिए आवश्यक वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध करा रहा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल की तैनाती और विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे समानांतर अनुसंधानों के माध्यम से गुजरात और राजस्थान को वैज्ञानिक तथा तकनीकी सहायता का व्यापक विस्तार किया गया है। वन हेल्थ दृष्टिकोण के तहत मानव, पशु और वाहक निगरानी को एकीकृत कर चांदीपुरा वायरस के प्रकोप को बेहतर ढंग से समझने, नियंत्रित करने और भविष्य में प्रभावी रोकथाम रणनीति विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
चांदीपुरा वायरस पर केंद्र की बड़ी पहल: गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल तैनात, बहु-संस्थागत वैज्ञानिक जांच तेज
