Hazrat Baba Badkhshani
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रायपुर 9 मार्च 2026/ ETrendingIndia / 112th Urs of Hazrat Baba Badkhshani from March 10 / हजरत बाबा बदख्शानी उर्स , मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिला मुख्यालय स्थित दरगाह हजरत सैय्यद कुरबान अली शाह बदख़्शानी का 112वां उर्स 10 मार्च 2026 से प्रारम्भ होने जा रहा है जो आगामी 15 मार्च तक चलेगा। इस उर्स में ज़ियारत करने के लिए मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में जायरीन आते हैं। यह उर्स प्रदेश और देश में राजगढ़ की पहचान बन गया है।

हर साल उर्स कमेटी और जिला प्रशासन यहां की माकूल व्यवस्था करता है। इसके अलावा शहर के अन्य धर्मों के नागरिक भी उर्स में बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं।

पहली बार किसी कलेक्टर ने दरगाह परिसर में ली थी बैठक

उर्स की व्यवस्थाओं को लेकर दरगाह परिसर में साल 2015 में उस समय के कलेक्टर श्री आनंद कुमार शर्मा (IAS) की अध्यक्षता में बैठक सम्पन्न हुई थी। यह पहला मौका था जब किसी कलेक्टर ने दरगाह शरीफ में आकर उर्स को लेकर इस तरह से बैठक की हो।

बैठक में तत्कालीन एसपी श्री शशिकांत शुक्ला, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री संजय सिंह, एसडीएम श्रीमती अंजलि शाह, जिला वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदर अब्दुल हकीम नियाजी, विभिन्न विभागों के अधिकारी सहित उर्स इन्तजामिया कमेटी के सदस्य मौजूद थे ।

इस मौके पर कलेक्टर श्री शर्मा के सुझाव पर बैठक में सर्व सम्मति से निर्णय लिया गया कि उर्स में आने वाले लोग अपने साथ थैला, झोला बैग जो भी आवश्यक समझें साथ लाएं ताकि पॉलिथिन के उपयोग पर लगाम लग सके। इसके साथ ही दुकानदारों के परिचय पत्र भी बनाए जाने निर्देश प्रबंधन समिति को दिए गए थे।

114 साल पहले आए थे बाबा

दरगाह शरीफ और बाबा साहब के सेवादार परिवार के 5वीं पीढ़ी के वरिष्ठ समाजसेवी एडवोकेट राशिद जमील साहब ने बताया कि करीब 114 साल पहले हजरत सैय्यद कुरबान अली शाह अफ़गानिस्तान के बदख़्शा शहर से राजगढ़ आए थे। इसके बाद वह यहीं के होकर रह गए। उन्हें बच्चों से बेहद प्रेम था। उनकी साफगोई, सहृदयता, रूहानी शक्तियों और चमत्कार के कई किस्से पुराने लोग आज भी सुनाते हैं। बताते हैं कि राजगढ़ रियासत के राजा रावत वीरेन्द्रसिंह ने बाबा साहब को अपार सम्मान दिया। बाबा साहब के सन 1915 में इंतकाल के बाद से ही उनकी दरगाह पर हर साल उर्स लगता है।

कौमी एकता की अनोखी मिसाल

सन 1981-82 में शहर के कुछ जागरूक नागरिकों ने कौमी एकता और सांप्रदायिक सदभाव को मजबूत करने के लिए एक अनोखी पहल की थी। नगर के पारायण चौक स्थित श्री राम-जानकी मंदिर से एक चादर जन सहयोग से खरीदी गई थी। इसे बैंड-बाजों के साथ जुलूस के रूप में दरगाह शरीफ ले जाकर अकीदत के साथ पेश किया गया था। यह परम्परा शुरू करने वालो में कलमकार परिषद के स्व. श्री रामसिंह प्रहरी और श्री दिनेश नागर प्रमुख हैं। इसी तरह दरगाह शरीफ से निशान [झंडा] भी मुस्लिम भाइयों द्वारा लाया जाता था, जिसे मंदिर परिसर में स्थापित किया जाता था।

नगर में और भी हैं प्रमुख स्थान

नगर में बाबा बदख़्शानी की दरगाह के अलावा हजरत प्यारे शाह साहब की दरगाह पुरा मोहल्ला में स्थित है। इस चमत्कारी संत के बारे में लोगो को बेहद कम जानकारी है। कहा जाता है कि ये वही हजरत प्यारे शाह हैं, जिन्होंने राजगढ़ रियासत के राजा रावत मोती सिंह की असाध्य बीमारी को ठीक किया था। इसी तरह पुराना बस स्टैंड क्षेत्र में मस्तान अम्मा की दरगाह भी लोगों की आस्था का केंद्र है। इनके चमत्कार के किस्से भी लोगों की जुबानी सुनाई देते हैं। इनमे नेवज नदी में आई भीषण बाढ़ के दौरान मस्तान अम्मा द्वारा बाढ़ को रोक दिया जाना प्रमुख घटना बताई जाती है।

मेला रहता है आकर्षण का केंद्र

दरगाह परिसर में करीब एक माह तक लगने वाला मेला नगर और क्षेत्र के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां मनोरंजन के कई साधनों के आलावा दीनी क़िताबों, क्राकरी, घरेलू सामान आदि की दुकाने प्रमुख रहती हैं।

बाबा साहब 1891 में राजगढ़ पधारे थे कुछ समय राजगढ़ में रह कर वापिस चले गए थे तथा 1902 में पुनः पधारे थे। बाबा साहब का पूरा नाम सैय्यद कुर्बान अली शाह था। उनका जन्म स्थान अफगानिस्तान का शहर बादकशा है। ये दरगाह गुरु शिष्य परंपरा की है जिस का मूल मंत्र है कि यदि आप को ईश्वर, अल्लाह, गॉड जिस में भी श्रद्धा है उस तक पहुंचने का रास्ता आप का गुरु जिसे पीर कहते वही दिखाता है।बिना सदगुरु के आप का जीवन शून्य है।

इस वर्ष का उर्स इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बाबा साहब का स्वर्गवास इस्लामी कलेंडर से 20 रमज़ान को हुआ था और उर्स का पहला दिन 10 मार्च को 20वां रमज़ान है।*