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रायपुर, 04 नवंबर 2026 / ETrendingIndia / प्रकृति का संरक्षण केवल जंगलों और वन्यजीवों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, प्राकृतिक संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने से भी जुड़ा है। इसी सोच को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के उद्देश्य से हर साल 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र दिवस (International Day for Biosphere Reserves) मनाया जाता है। यह दिवस जैव विविधता के संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग और पर्यावरण के अनुकूल विकास की जरूरत को रेखांकित करता है। बायोस्फीयर रिजर्व ऐसे मॉडल हैं, जहां प्रकृति की विरासत को सुरक्षित रखने के साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका और विकास को भी महत्व दिया जाता है।

यूनेस्को ने 2021 में की थी दिवस की घोषणा

अंतरराष्ट्रीय जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र दिवस की घोषणा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के 41वें महासम्मेलन में वर्ष 2021 में की गई थी। इसके बाद हर साल 3 नवंबर को यह दिवस मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य दुनिया भर में बायोस्फीयर रिजर्व के महत्व को रेखांकित करना और ऐसे संरक्षण मॉडल को प्रोत्साहित करना है, जिसमें प्रकृति और मानव समुदायों के बीच सामंजस्य बना रहे। यूनेस्को ने वर्ष 1971 में ‘मैन एंड बायोस्फीयर’ (एमएबी) कार्यक्रम शुरू किया था। इसके तहत ऐसे क्षेत्रों की पहचान और विकास किया जाता है, जहां जैव विविधता संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण शिक्षा और सतत विकास को एक साथ आगे बढ़ाया जा सके। बायोस्फीयर रिजर्व इसी वैश्विक कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

क्या होते हैं बायोस्फीयर रिजर्व?

बायोस्फीयर रिजर्व ऐसे विशिष्ट प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं, जिन्हें जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों के सतत विकास के लिए विकसित किया जाता है। इनमें दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों, पक्षियों, समुद्री जीवों और प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जरूरतों को भी संरक्षण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। इनका उद्देश्य केवल जंगलों और वन्यजीवों को मानवीय गतिविधियों से अलग रखकर बचाना नहीं है, बल्कि यह दिखाना भी है कि प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करते हुए स्थानीय लोगों की आजीविका को मजबूत किया जा सकता है।

तीन क्षेत्रों में बंटे होते हैं जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र

बायोस्फीयर रिजर्व को मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में बांटा जाता है। पहला कोर क्षेत्र होता है, जहां प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता का सख्त संरक्षण किया जाता है। यहां मानवीय गतिविधियां बेहद सीमित रहती हैं। दूसरा बफर क्षेत्र होता है, जो कोर क्षेत्र के आसपास स्थित रहता है। यहां वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण शिक्षा, प्रशिक्षण और पर्यावरण के अनुकूल सीमित गतिविधियों की अनुमति होती है। तीसरा ट्रांजिशन क्षेत्र होता है, जहां स्थानीय समुदाय रहते हैं और खेती, वानिकी, पर्यटन तथा आजीविका से जुड़ी अन्य गतिविधियां संचालित करते हैं। यहां प्राकृतिक संसाधनों के सतत और जिम्मेदार उपयोग पर जोर दिया जाता है। इन तीनों क्षेत्रों का साझा उद्देश्य प्रकृति संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना है।

145 देशों में फैले हैं 797 बायोस्फीयर रिजर्व

बायोस्फीयर रिजर्व का वैश्विक नेटवर्क लगातार विस्तार कर रहा है। यूनेस्को के वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, विश्व नेटवर्क ऑफ बायोस्फीयर रिजर्व में 145 देशों के 797 क्षेत्र शामिल हैं। ये क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण के साथ लगभग 30 करोड़ लोगों के जीवन और आजीविका से भी जुड़े हुए हैं। इनका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, प्राकृतिक आवासों का विनाश, प्रदूषण और वन्यजीवों का अवैध शिकार जैसी चुनौतियां दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में बायोस्फीयर रिजर्व प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं।

भारत में 18 जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र, 13 को यूनेस्को की मान्यता

भारत जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। यहां हिमालय के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र, पश्चिमी घाट के वर्षावन, रेगिस्तान, मैंग्रोव वन, द्वीप समूह और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र जैसी प्राकृतिक विविधताएं मौजूद हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, भारत में कुल 18 अधिसूचित बायोस्फीयर रिजर्व हैं। इनमें से 13 यूनेस्को के विश्व नेटवर्क ऑफ बायोस्फीयर रिजर्व में शामिल हैं।।भारत के प्रमुख बायोस्फीयर रिजर्व में नीलगिरि, नंदा देवी, नोकरेक, मन्नार की खाड़ी, सुंदरबन, ग्रेट निकोबार, सिमलीपाल, पचमढ़ी, कंचनजंगा, अगस्त्यमलाई, अचानकमार-अमरकंटक, कोल्ड डेजर्ट और पन्ना शामिल हैं। इन क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के प्राकृतिक आवास और दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। सुंदरबन अपने विशाल मैंग्रोव वनों और रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध है। नीलगिरि क्षेत्र हाथियों, बाघों और दुर्लभ वनस्पतियों का महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है। नंदा देवी और कंचनजंगा हिमालय की समृद्ध जैव विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि मन्नार की खाड़ी समुद्री जैव विविधता, प्रवाल भित्तियों और समुद्री जीवों के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

कोल्ड डेजर्ट को 2025 में मिली यूनेस्को की मान्यता

भारत के संरक्षण प्रयासों में वर्ष 2025 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हिमाचल प्रदेश के कोल्ड डेजर्ट बायोस्फीयर रिजर्व को यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में शामिल किया जाना रहा। यह क्षेत्र लगभग 7,770 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें पिन वैली नेशनल पार्क और आसपास के महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र शामिल हैं। यहां हिम तेंदुआ, हिमालयी आइबेक्स, नीली भेड़ और अनेक दुर्लभ वनस्पतियां पाई जाती हैं। ऊंचाई वाले ठंडे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिहाज से यह क्षेत्र विशेष महत्व रखता है। इसके शामिल होने के बाद यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में भारत के बायोस्फीयर रिजर्व की संख्या बढ़कर 13 हो गई।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना संरक्षण अधूरा

बायोस्फीयर रिजर्व की सफलता में स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण समुदाय लंबे समय से जंगलों, जल स्रोतों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहे हैं। उनके पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवनशैली को संरक्षण की प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है। स्थानीय लोगों को पर्यावरण अनुकूल पर्यटन, जैविक खेती, हस्तशिल्प, लघु वनोपज और अन्य टिकाऊ आजीविका गतिविधियों से जोड़कर आर्थिक अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। इससे लोगों की आय में सुधार के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव भी कम किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ा महत्व

दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, जंगलों में आग, सूखा, बाढ़ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इनका सीधा प्रभाव जैव विविधता और प्राकृतिक आवासों पर पड़ रहा है। बायोस्फीयर रिजर्व इन चुनौतियों के प्रभाव को समझने, वैज्ञानिक अध्ययन करने और संरक्षण की प्रभावी रणनीतियां विकसित करने के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।।ये क्षेत्र कार्बन अवशोषण, जल संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और पारिस्थितिक संतुलन कायम रखने में भी योगदान देते हैं। इनके संरक्षण से वन्यजीवों और वनस्पतियों का अस्तित्व सुरक्षित रखने के साथ मानव जीवन के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलती है।

संरक्षण के साथ सतत विकास का संदेश

अंतरराष्ट्रीय जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र दिवस केवल एक पर्यावरणीय आयोजन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति मानवता की जिम्मेदारी याद दिलाने का अवसर भी है। इसका संदेश स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन करके विकास का स्थायी मॉडल तैयार नहीं किया जा सकता। विकास की प्रक्रिया में जैव विविधता, स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी तंत्र की जरूरतों को समान महत्व देना होगा। भारत जैसे विशाल और जैव विविधता से समृद्ध देश के लिए बायोस्फीयर रिजर्व का संरक्षण भविष्य की पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़ा है। इन क्षेत्रों को सुरक्षित रखना केवल सरकार या पर्यावरण विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सामूहिक जिम्मेदारी है। 


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