Share This Article रायपुर, 25 अक्टूबर। Kargil Hero Naik Deepchand: कुछ कहानियां आंखों को नम कर देती हैं, तो कुछ जिंदगी जीने का नया हौसला देती हैं। जिस्म का एक हिस्सा भले ही जंग के मैदान में छूट गया हो, लेकिन हौसले आज भी वही हैं, जो कारगिल की पहाड़ियों पर गूंजते थे। गोली, बारूद और गंभीर जख्म भी जिसके बुलंद इरादों को डिगा नहीं सके, आज उस वीर योद्धा नायक दीपचंद की जिंदादिली देश के हर नागरिक को सिखा रही है कि जिंदगी से हार कैसे नहीं माननी चाहिए। दीपचंद्र पुणे से अपनी कार खुद चलाकर आए थे; यहां एक दिन रुकने के बाद, वे आज संबलपुर के लिए निकल गए, और वहां से वे पुरी जाएंगे। अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान etrendingindia.com से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, राष्ट्र से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है। राष्ट्र की आन, बान और शान ही सर्वोच्च है। युद्ध के मैदान में हथियार का महत्व तो है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उसके अन्दर का हौसला, कौशल और जज्बा। दुश्मनों पर तोप से गोले बरसाए दीपचंद ने देश की रक्षा के लिए दुश्मनों पर तोप से गोले बरसाए और मातृभूमि की सेवा करते हुए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। ऑपरेशन के दौरान दोनों पैर गंवा दिए, जिंदगी बचने की उम्मीद भी बेहद कम थी, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा। आज भी चेहरे पर मुस्कान और दिल में देशभक्ति का जज्बा लिए नायक दीपचंद दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि सच्चा योद्धा वह नहीं, जो कभी घायल न हो, बल्कि वह है जो हर मुश्किल के बाद भी हिम्मत से खड़ा रहे। आज के जेन जी युवाओं को चाहिए कि वे देश के वीर जवानों के जज्बे, समर्पण और देशभक्ति को पहचाने, वे किन कठिन परिस्थितियों में देश की सेवा करते हैं उसका अनुभव करें।उन्होंने कहा, केवल सैनिक बनकर सेवा करना ही राष्ट्र सेवा नहीं है, अगर हम अपनी दायित्वों और कर्तव्यों को अच्छे से करते हैं तो वह भी राष्ट्र सेवा है। उन्होंने युवाओं से कहा, वाहन चलाते समय यातायात के नियमों का पूरा पालन करें, खुद सुरक्षित रहें और दूसरों को भी सुरक्षित रखें। उन्होंने युवाओं से कहा, वे जीवन को और अपने कार्यों को पूरे उत्साह और उमंग के साथ करें। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर से मिली सेना में जाने की प्रेरणा हरियाणा के हिसार जिले के पावड़ा गांव के रहने वाले नायक दीपचंद छह भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। बताया जाता है कि बचपन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने का सपना देखा। इसी जुनून ने उन्हें देश की सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ाया। उनकी आत्मनिर्भरता और जिंदादिली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद वे विशेष रूप से मॉडिफाइड वाहन खुद ड्राइव करते हैं और अपनी दैनिक गतिविधियों को पूरी स्वायत्तता के साथ पूरा करते हैं। हैंड-कंट्रोल मैकेनिज्म विशेष कार चूंकि नायक दीपचंद ने अपने दोनों पैर और एक हाथ देश के लिए युद्ध में समर्पित कर दिया था, इसलिए उनके इस विशेष वाहन को इस तरह से मॉडिफाइड किया जाता है कि एक्सीलेटर, ब्रेक और क्लच जैसी सभी मुख्य ड्राइविंग गतिविधियां केवल हाथों के इशारों और नियंत्रण से संचालित हो सकें। इस मॉडिफाइड कार के जरिए वे बिना किसी पर निर्भर रहे खुद सफर करते हैं, कार्यक्रमों में शामिल होते हैं और समाज में युवाओं को राष्ट्रभक्ति का संदेश देते हैं। उनका यह वाहन केवल एक गाड़ी नहीं है, बल्कि उनके उस फौजी मिजाज का प्रमाण है जो विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी घुटने नहीं टेकता और हर मुश्किल को हराकार आगे बढ़ना जानता है। नायक दीपचंद की यह विशेष गाड़ी और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी दिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो शारीरिक सीमाएं कभी भी इंसान की तरक्की और स्वतंत्रता में बाधा नहीं बन सकतीं। कारगिल युद्ध में निभाई अहम भूमिका नायक दीपचंद का जन्म 19 मई 1975 को हरियाणा के हिसार जिले के पाबड़ा (पंचग्रामी) गांव में हुआ था। उन्होंने भारतीय तोपखाने में तोपची के रूप में 1889 मिसाइल रेजिमेंट से जुड़े रहे। उन्होंने ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन पराक्रम जैसे सैन्य अभियानों में भाग लिया। ऑपरेशन विजय के दौरान कारगिल की दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सेना की कार्रवाई में तोपखाने की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, नायक दीपचंद की यूनिट ने युद्ध के दौरान कई गन पोजिशन से दुश्मन के ठिकानों पर भारी गोलाबारी की। करीब 10 हजार गोले दागे जाने का उल्लेख भी किया गया है। बताया जाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी दीपचंद ने राशन के बजाय गोला-बारूद की अधिक आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि दुश्मन के खिलाफ अभियान को मजबूती मिल सके। ऑपरेशन पराक्रम में गंवाए दोनों पैर, फिर भी नहीं हारी हिम्मत नायक दीपचंद के जीवन का सबसे कठिन दौर ऑपरेशन पराक्रम के दौरान आया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, एक विस्फोट में उनके दोनों पैर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। उनकी जान बचाने के लिए डॉक्टरों को दोनों पैर काटने पड़े। उस समय उनकी जान बचने की संभावना बेहद कम बताई गई थी। लेकिन दीपचंद ने जिंदगी के सामने हार नहीं मानी। गंभीर चोटों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मुस्कान को बनाए रखा। उनका संघर्ष बताता है कि सैनिक की बहादुरी केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं होती, बल्कि मुश्किल हालात में जिंदगी को दोबारा जीने का साहस भी उतना ही बड़ा होता है। जनरल बिपिन रावत ने दिया था ‘कारगिल योद्धा’ सम्मान बताई गई जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ पर द्रास में आयोजित कार्यक्रम के दौरान तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने नायक दीपचंद को ‘कारगिल योद्धा’ की उपाधि से सम्मानित किया था। यह सम्मान उनके सैन्य योगदान और साहस की याद दिलाता है। आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं नायक दीपचंद आज नायक दीपचंद की जिंदगी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किलों के सामने हिम्मत हार जाते हैं। उनका संघर्ष देश के प्रति समर्पण, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का संदेश देता है। नायक दीपचंद की कहानी हमें सिखाती है कि देश के लिए लड़ने वाला सैनिक केवल सीमा पर ही नहीं, बल्कि जिंदगी की हर चुनौती के सामने भी योद्धा बना रहता है। ऐसे वीर जवानों के साहस और बलिदान को देश हमेशा सलाम करता रहेगा। पौधों की देखभाल और अनुशासित दिनचर्या सामने आए वीडियो में नायक दीपचंद अपने घर के बगीचे में टहलते, हरियाली के बीच पौधों की देखभाल करते और अपनी दैनिक गतिविधियों को सहजता से पूरा करते नजर आ रहे हैं। जीवन में आई इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी उनके चेहरे की मुस्कान और आत्मविश्वास यह बताने के लिए काफी है कि उन्होंने परिस्थितियों के आगे झुकना नहीं सीखा। घर में सहेजी देश सेवा की यादें उनके निवास स्थान पर देशभक्ति का माहौल हर कोने में महसूस होता है। घर के भीतर सैनिकों के बलिदान, वीरता पुरस्कारों और भारतीय सेना से जुड़ी स्वर्णिम यादों को बड़े ही गर्व के साथ सहेजकर रखा गया है। यह कोना न केवल उनके गौरवशाली अतीत की गवाही देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति का पाठ भी पढ़ाता है। युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज कारगिल के इस महान योद्धा का जीवन संदेश देता है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि मन के विचारों और हौसले में होती है। रायपुर और देशभर के युवाओं के लिए नायक दीपचंद की यह जीवनशैली संघर्ष से उबरकर जीने की नई राह दिखाती है। Share This Article Post navigation International Snow Leopard Day 2026 : हिम तेंदुए के संरक्षण की क्यों है जरूरत? भारत में मिले 718 हिम तेंदुए, जानें चुनौतियां और सरकारी प्रयास