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रायपुर, 20 अगस्त 2026/ ETrendingIndia / सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को श्रम कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में 6:3 के बहुमत से फैसला सुनाया कि वर्ष 1978 में ‘उद्योगÓ की परिभाषा को लेकर दिए गए श्रमिक हितैषी फैसले को औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या का आधार नहीं बनाया जाएगा। अदालत के इस फैसले को श्रम कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति उज्जल भुयान, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे। पीठ ने मार्च में इस मामले पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था।


21 फरवरी 1978 को सात न्यायाधीशों की पीठ ने बैंगलोर जल आपूर्ति एवं सीवेज बोर्ड मामले में ‘उद्योगÓ के दायरे को व्यापक रूप से परिभाषित किया था। इस फैसले का प्रभाव औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों पर पड़ा था।
फैसले के बाद अस्पतालों, विद्यालयों, क्लबों और कल्याणकारी विभागों सहित कई क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी औद्योगिक कानूनों के तहत संरक्षण मिलने का रास्ता खुला। वर्ष 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर ने ‘उद्योगÓ की पहचान के लिए त्रि-स्तरीय परीक्षण निर्धारित किया था। इसके तहत ऐसी व्यवस्थित गतिविधि, जिसमें वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन अथवा वितरण के लिए नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच सहयोग शामिल हो, को ‘उद्योगÓ के दायरे में माना गया था। इस व्यापक परिभाषा के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले बड़ी संख्या में कर्मचारियों को श्रम कानूनों के तहत कानूनी सुरक्षा हासिल हुई।


गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत के फैसले में माना कि 1978 के फैसले में ‘उद्योगÓ शब्द की परिभाषा पर पुनर्विचार की मांग करने वाला संदर्भ वैध रूप से पीठ के सामने आया था। मुख्य न्यायाधीश ने अपने साथ न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की ओर से बहुमत का फैसला लिखा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में विकसित किया गया त्रि-स्तरीय परीक्षण अपनी जगह वैध रहेगा, लेकिन इसे औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या पर लागू नहीं किया जाएगा।


नई संहिता के तहत आने वाले मामलों का फैसला उसके अपने प्रावधानों, तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा। यानी 2020 की संहिता में ‘उद्योगÓ की अवधारणा को समझने के लिए 1978 के फैसले को स्वत: आधार नहीं माना जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत दर्ज और लंबित श्रम विवादों में 1978 के बैंगलोर जल आपूर्ति मामले में निर्धारित त्रि-स्तरीय परीक्षण लागू रहेगा। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह फैसला भविष्य में प्रभावी होगा, जबकि 1947 के अधिनियम के तहत लंबित मामलों का निपटारा 1978 में निर्धारित ‘उद्योगÓ की परिभाषा के अनुसार किया जाएगा।


न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने अलग-अलग फैसले लिखे। दोनों के फैसले मुख्य न्यायाधीश के बहुमत वाले निर्णय से व्यापक रूप से सहमत रहे। दोनों न्यायाधीशों ने माना कि 1978 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाला संदर्भ उचित था। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। उनकी प्रमुख आपत्ति नौ न्यायाधीशों की पीठ के सामने भेजे गए संदर्भ की स्वीकार्यता को लेकर थी। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि 1978 का फैसला सही था और उसे पुनर्विचार के लिए भेजने की आवश्यकता नहीं थी।


नौ न्यायाधीशों की पीठ इस बात से सहमत रही कि 1947 का औद्योगिक विवाद अधिनियम अब निरस्त हो चुका है और उसकी जगह नया कानून लागू हो गया है। ऐसे में पुराने कानून के संदर्भ में ‘उद्योगÓ की परिभाषा पर पुनर्विचार का मामला काफी हद तक सैद्धांतिक बन गया है। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में तय सिद्धांतों को औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या का व्यापक आधार नहीं माना जाएगा। नई संहिता की व्याख्या उसके अपने प्रावधानों के आधार पर स्वतंत्र रूप से की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में नौ न्यायाधीशों की पीठ के सामने विचार के लिए मुख्य कानूनी सवाल तय किए थे। इसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी की और मार्च में फैसला सुरक्षित रखा था।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से 1947 के पुराने औद्योगिक विवाद कानून के तहत लंबित मामलों और 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के तहत नए मामलों के बीच कानूनी स्थिति स्पष्ट हो गई है।


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