Share This Article क्या तुम अँधकार में देख सकते हो?“हाँ…”थियो ने देखा थाप्रकाश का पहला बीज। वह मिट्टी बना उस वृक्ष की,जिसे उगते किसी ने नहीं देखा। क्योंकि बीज हमेशाअँधेरे की गोद मेंअंकुरित होते हैं। थियो का विश्वाससूरजमुखी बनकर खिला,और उसका पसीनाआलू खाने वालों की आँखों मेंभूख का रंग भर गया। विन्सेंट रंग नहीं बनाता था,वह थियो के विश्वास कादृश्य रचता था। एक ने रंगों को जन्म दिया,दूसरे ने उन रंगों परसमय का पहरा दिया। जब संसार ने कहा “यह पागल है”थियो ने कहा “यह भविष्य है।” कुछ संबंध शब्दों से नहीं,प्रतीक्षा से लिखे जाते हैं। थियो ने विन्सेंट को नहीं संभाला,उसने बसउसे गिरने की पूरी स्वतंत्रता दी… और हर बार धरती बनकरउसे थाम लिया। विन्सेंटथियो की ज़मीन पर उगावह फल है, जिसका स्वाददुनिया आज भी कला कहकर चखती है। हर महान चित्र के पीछेएक अदृश्य हाथ होता है,और हर प्रकाश के पीछेकोई न कोई अँधकार मेंचुपचाप जल रहा होता है। -मनोज मौर्य12 July 2026, Germany रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है…. Share This Article Post navigation National Theatre Festival : गोवा में राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव की तैयारियां तेज…! कालिदास जयंती और ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पर होगा भव्य आयोजन विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छाप : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री को भेंट की बस्तर की ढोकरा ट्री ऑफ लाइफ शिल्पकृति…