Late Baba Ambadat
Late Baba Ambadat
Share This Article

रायपुर 19 मार्च 2026/ ETrendingIndia / Late Baba #Ambadat #Special for Indian: “What to live for yourself” Baba has fulfilled these lines. / बाबा अंबादत्त भारतीय स्मृति , स्व. अंबादत्त भारतीय स्मृति पत्रकारिता सम्मान समारोह 22 मार्च 2026 को सीहोर, मध्यप्रदेश में आयोजित होने वाला है

आज बाबा इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी स्मृतियां आज भी जीवित हैं.. बाबा आज भी पत्रकारिता,शिक्षा व सामाजिक गतिविधियों में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहते है ।

प्रसंग

अरे तुम तो वही बच्चे हो जो ग्राम कोठरी में रहते हो…यहां क्या कर रहे हो…..मस्तमौला अंदाज,आंखों में गजब की चमक,गंभीर चेहरे के भाव, गज़ब की बोलने शैली,लम्बी दाड़ी कोई भी उन्हें देखे तो देखता रह जाए…मैंने भी बाबा को पहली बार ही देखा था !

इंसान अपने कर्मो से #महानता की सीमाओं को लांघता है,इंसान तो इस भौतिक दुनिया से रुखसत हो जाता है किंतु समय रूपी रेत पर अमिट स्मृतियों व निशानियों को छोड़ जाता है और हमेशा-हमेशा के लिए #अमर हो जाता है ।

इंसान तो अमरत्त्व को प्राप्त कर लेता है किंतु ऐसी महान विभूतियों की स्मृतियां को सहेजना व उन्हें जीवित रखकर स्मरण करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती है,उनके द्वारा किए कामों को समाज के लोगों के बीच प्रकाश में लाना ताकि समाज जागरूकता और बदलाव की क्रांति की मशाल निरंतर जलती रहे l

एक ऐसी ही इस दुनिया से महान विभूति के रूप में बाबा अंबादत्त भारतीय अपनी अमिट छाप छोड़ कर गए है जिन्होंने सारा जीवन दूसरों के लिए जी कर बता दिया कि “जीना इसी का नाम है” अपने लिए जीए तो क्या जीए ।

बाबा की स्मृतियों को,उनकी निशानियों को संजोकर रखा है,उनके कृतियों को उनके हृदय के बहुत ही करीब, बहुत ही अच्छे व सच्चे इंसान के रूप में वरिष्ठ पत्रकार #रघुवर #दयाल #गोहिया ने बाबा अंबादत्त भारतीय पत्रकारिता एवं शोध संस्थान के माध्यम से जीवित रखा है,उन्हीं की याद में स्व. अंबादत्त भारतीय स्मृति पत्रकारिता सम्मान समारोह का आयोजन होता है ।

पत्रकारिता के स्तंभ के रूप में…!!!!

सिद्वपुर,सीहोर के पत्रकारिता के इतिहास को यदि खंगाला जाएं तो इस इतिहास में से एक नाम निकल कर आता है । वह नाम है बाबा भारतीय का जिनको लोग प्यार से अंबादत्त बाबा कहकर बुलाते थे,कहते है कि आदमी जब इस सृष्टि में जन्म लेता है, ईश्वर उसे विशेष कर्मो के लिए निमित करता है, उन श्रेष्ठ कर्मो को करके ही आदमी महानता की सीमा को लांघता है और अपना नाम इस भौतिक संसार में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर जाता है ।

सम्पूर्ण जीवन को पत्रकारिता के रूप में बिताया,बहुत ही साधारण, सहज,सरल व्यक्तिव के धनी जिनका जीने का अंदाज ही सबसे अलग रहा जो कुछ भी किया सिर्फ दूसरों के लिए…. अपने लिए कुछ भी नहीं ।

पत्रकारिता,शिक्षा व सामाजिक क्ष्रेत्र में बाबा ने जो योगदान इस माटी को दिया है,वह असाधारण है,शिक्षा की अलख जगाने हेतु बाबा शिक्षा अभियान से जुड़े और लोगों को जोड़कर नुक्कड़ नाटक व व्यख्यान के माध्यम से समाज में शिक्षा की अलख जगाई ।

अपनी कलम से वो काम कर दिया इसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था,एक निडर व निर्भीक पत्रकार के रूप में बाबा को जाना जाता है,बाबा अपने आप में ज्ञान का एक खजाना थे,विभिन्न विषयों की किताबों का अध्ययन बाबा ने किया,इनके द्वारा समाज में कई ऐसे काम हुए जिससे समाज में बदलाव आया ।

बाबा की पुण्यतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्तर का सम्मान “बाबा अंबादत अंबादत्त भारतीय पत्रकारिता सम्मान” देश के नामी पत्रकारों को दिया जाता है और इस आयोजन को करने में वरिष्ठ पत्रकार रघुवर गोहिया की विशेष भूमिका होती है…इसी के साथ “बाबा अंबादत्त भारतीय पत्रकारिता शोध संस्थान” को सुचारू चलता है जहाँ पत्रकारिता के विभिन्न विषयों पर शोध होता है ।

प्रसंग

मेरा सौभाग्य है कि गांव ( कोठरी ) जहां पर मेरा जन्म हुआ वही से 10वीं तक शिक्षा प्रात की…वहां के कन्या माध्यमिक शाला स्कूल के प्रांगण में पहली बार बाबा को देखा..,मस्तमौला अंदाज,आंखों में गजब की चमक,गंभीर चेहरे के भाव,लम्बी दाड़ी कोई भी उन्हें देखे तो देखता रह जाए ।

उस समय बाबा अंबादत्त भारतीय व उनकी टीम शिक्षा के प्रति अभियान हेतु नुक्कड़ नाटक की रिहर्सल किया करते थे,हर शाम को नुक्कड़ नाटक के पात्र जिनको बाबा डायरेक्टर के रूप में डायरेक्शन देते थे ।

मैं और मेरे दोस्त उन सभी को देखकर प्रेरित होते थे,मेरे गाँव के कई युवा उनकी टीम के सदस्य के रूप में शिक्षा की अलख जगाया करते थे ।

जब मेरा परिवार सीहोर में शिफ्ट हो गया तो मैं यही सोचता था कि वो लम्बी दाड़ी वाले बाबा कहां मिलेंगे क्योंकि मैं इस शहर के लिए पूर्ण रूप से नया था, लेकिन मैंने सोचा कि जब बाबा मिलेंगे तो उन्हें बताऊंगा कि बाबा मैं वही बालक हूँ जो आपका नुक्कड़ नाटक स्कूल में देखा करता था और आप से पूछता था कि क्या मैं भी नुक्कड़ नाटक में काम कर सकता हूं ।

संयोगवश एक दिन बाबा से मेरी मुलाकात हो गई उन्हें देखकर मैं बहुत खुश हुआ… मैंने उनसे पूछा कि आपने पहचाना मुझे,तो बाबा ने कहा तुम तो वही बालक हो जो कोठरी में रहते हो और तुम्हारा घर भी स्कूल के ही बगल में है…यहाँ क्या कर रहे हो… मैं बहुत खुश हुआ यह सोचकर कि बाबा ने मुझें पहचान लिया ।

आज बाबा इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी स्मृतियां आज भी जीवित हैं.. बाबा आज भी पत्रकारिता,शिक्षा व सामाजिक गतिविधियों में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहते है ।

प्रदीप चावड़ा
( साभार)