रायपुर, 16 जुलाई 2026/ ETrendingIndia / “Delhi: Construction of 148 km highway from mountains of garbage, utilization of 14.4 lakh tonnes of waste…” राजधानी दिल्ली की पहचान बन चुके कूड़े के पहाड़ों पर जमा कचरा बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण में इस्तेमाल हो रहा है. कचरे के पहाड़ों को खत्म करने की दिशा में अब दिल्ली के लैंडफिल साइट्स पर जमा सदियों पुराने कचरे से न केवल पर्यावरण सुधर रहा है, बल्कि यह कचरा देश की अत्याधुनिक सड़कों का आधार भी बन रहा है.
केंद्रीय राज्यमंत्री और प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने बताया कि दिल्ली के अलग-अलग हाईवे प्रोजेक्ट्स में अब तक कुल 14.4 लाख मीट्रिक टन कचरे का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है.
इस पहल के तहत सबसे बड़ी उपलब्धि 75 किलोमीटर लंबे अर्बन एक्सटेंशन रोड (यूईआर-2) का निर्माण है, जिस पर आज वाहन फर्राटा भर रहे हैं.
भलस्वा लैंडफिल साइट से निकले 10.2 लाख मीट्रिक टन कचरे का इस्तेमाल
उन्होंने बताया कि इस महत्वपूर्ण सड़क के निर्माण में भलस्वा लैंडफिल साइट से निकले 10.2 लाख मीट्रिक टन कचरे का इस्तेमाल किया गया है.
कचरा प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण
यह न केवल कचरा प्रबंधन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि निर्माण लागत और संसाधनों की बचत का भी एक बेहतर विकल्प साबित हुआ है.
कचरे से सड़क निर्माण का यह सिलसिला यूईआर-2 तक ही सीमित नहीं है. दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के एक महत्वपूर्ण हिस्से, जो डीएनडी से सोहना तक बना है, के निर्माण में 3.4 लाख मीट्रिक टन कचरे का उपयोग किया गया है.
इस कचरे को ओखला और गाजीपुर लैंडफिल साइटों से लिया गया था, जिससे उन क्षेत्रों में जमा कचरे के पहाड़ों की ऊंचाई को कम करने में बड़ी मदद मिली है.
बहसूमा-बिजनौर हाईवे के निर्माण में उपयोग।
इसके अलावा, 39.5 किलोमीटर लंबे बहसूमा-बिजनौर हाईवे के निर्माण में भी दिल्ली के कचरे का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस प्रोजेक्ट में कुल 0.8 लाख मीट्रिक टन कचरा इस्तेमाल किए जाने का लक्ष्य है.
हाईवे प्रोजेक्ट्स में कचरे का इस्तेमाल अनिवार्य
कचरे के इन पहाड़ों को ठिकाने लगाने के लिए केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन-2 के तहत हाईवे प्रोजेक्ट्स में कचरे का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया था.
इसी के बाद एनएचएआई ने दिल्ली सरकार और एमसीडी से संपर्क साधा, जिसके सकारात्मक परिणाम अब सड़कों के रूप में दिखाई दे रहे हैं.
तकनीकी रूप से हाईवे निर्माण में इस कचरे का उपयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक किया जा रहा है. हाईवे के किनारे बांध बनाने के साथ-साथ, हाईवे कैरिजवे के भीतरी लेयर को 250 एमएम तक बनाने में भी इसी कूड़े का इस्तेमाल किया गया है.
सर्विस लेन के निर्माण में भी उपयोग
इतना ही नहीं, सड़कों के साथ बनने वाली सर्विस लेन के निर्माण में भी इसी कचरे का उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है.
दिल्ली के शहरी विकास विभाग और एनएचएआई अब अन्य आगामी रोड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी कचरे के इस्तेमाल की योजना बना रहे हैं.
इस पहल से जहां एक तरफ कचरे के पहाड़ों से दिल्लीवासियों को निजात मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी तरफ टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है.
बता दें कि पिछले माह 28 मई को केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने भलस्वा लैंडफिल साइट का औचक दौरा कर वहां चल रहे बायो-माइनिंग और बायो-रेमेडिएशन कार्यों का विस्तृत जायजा लिया था.
अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, जून 2022 में इस साइट पर लगभग 73 लाख मीट्रिक टन लीगेसी कचरा जमा था. निरंतर प्रयासों और आधुनिक मशीनों की तैनाती के बाद अब तक कचरे की मात्रा घटकर करीब 23.17 लाख मीट्रिक टन रह गई है.
साइट के कुल 70 एकड़ के दायरे में से 43 एकड़ भूमि अब तक पूरी तरह से खाली कराई जा चुकी है.भलस्वा लैंडफिल साइट दिल्ली की सबसे पुरानी डंपसाइट्स में से एक है, जो 1994 में शुरू हुई थी और 2006 में ही ओवरफ्लो घोषित कर दी गई थी.
