Global Gujarat
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रायपुर, 29 जुलाई / ETrendingIndia / लेखक – रमेश जायभाये,
उप निदेशक ,पत्र सूचना कार्यालय ,रायपुर

एक तरफ साबरमती के किनारे गांधी के विचारों की शांति… दूसरी तरफ GIFT City की गगनचुंबी इमारतों में गूंजती वैश्विक वित्त की हलचल…; बीच में लोथल की 4,500 वर्ष पुरानी समुद्री विरासत…, अमूल की सहकारिता की ताकत… हाई-स्पीड रेल की तकनीकी रफ्तार … और सैनंद में आकार लेता सेमीकंडक्टर युग…!

गुजरात की पांच दिवसीय यात्रा में छत्तीसगढ़ के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने एक ऐसे भारत को करीब से देखा, जहां इतिहास केवल अतीत में नहीं, बल्कि भविष्य की नींव में भी जीवित है।

किसी प्रदेश को समझने के लिए कभी-कभी उसके शहरों से ज्यादा उसके समय को देखना पड़ता है। गुजरात में यह समय एक साथ कई दिशाओं में चलता दिखाई देता है।

लोथल में करीब 4,500 वर्ष पुरानी समुद्री सभ्यता की स्मृतियां हैं, साबरमती में गांधी के विचारों की गूंज है, आनंद में सहकारिता आंदोलन की शक्ति है, सैनंद में सेमीकंडक्टर युग की दस्तक है और GIFT City में वैश्विक वित्त की महत्वाकांक्षा।

इनके बीच सरदार पटेल की विराट प्रतिमा खड़ी है—एक ऐसे भारत की याद दिलाती हुई, जिसने एकता को अपनी ताकत बनाया और अब वैश्विक मंच पर अपनी नई पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहा है।

भविष्य की राह में चलता गुजरात…

यही गुजरात की सबसे दिलचस्प तस्वीर है—यहां इतिहास पीछे छूटता नहीं, बल्कि भविष्य की राह में साथ चलता है।

पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर द्वारा आयोजित गुजरात अध्ययन दौरे पर पहुंचे छत्तीसगढ़ के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने इन अलग-अलग पड़ावों को करीब से देखा और समझा।

पांच दिनों के इस सफर में कभी महात्मा गांधी के जीवन और विचारों की स्मृतियों के बीच संवाद हुआ, कभी अमूल के माध्यम से गांव और किसान की आर्थिक शक्ति को समझने का अवसर मिला, तो कभी हाई-स्पीड रेल, सेमीकंडक्टर और अंतरराष्ट्रीय वित्त जैसे क्षेत्रों में भारत की बदलती आकांक्षाओं की झलक मिली।

इस यात्रा की खासियत शायद यही थी कि हर पड़ाव अगले पड़ाव से जुड़ता चला गया। साबरमती ने विचार दिया, आनंद ने सहकारिता की ताकत दिखाई, लोथल ने विरासत की गहराई बताई, हाई-स्पीड रेल ने तकनीकी महत्वाकांक्षा दिखाई, सैनंद ने औद्योगिक भविष्य की दस्तक सुनाई और GIFT City ने वैश्विक भारत की आर्थिक तस्वीर सामने रखी।

अपनी जड़ों को संभालते, दुनिया के सामने नई पहचान बनाने की कोशिश…

और फिर एकतानगर में सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा के सामने खड़े होकर लगा कि इन सभी कहानियों के बीच एक अदृश्य सूत्र मौजूद है—एक ऐसा भारत, जो अपनी जड़ों को संभालते हुए दुनिया के सामने अपनी नई पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है।

साबरमती : जहां शोर के बीच भी सुनाई देती है एक आवाज

साबरमती आश्रम पहुंचते ही यात्रा जैसे कुछ पल के लिए ठहर गई। कैमरों और मोबाइल फोन की चहल-पहल के बीच भी एक अलग तरह की खामोशी महसूस होती थी। शायद इसलिए कि यह वह जगह थी, जहां कभी एक ऐसे व्यक्ति ने अपने प्रयोग किए थे, जिसकी आवाज बाद में पूरे देश की आवाज बन गई।

कोचरब आश्रम में महात्मा गांधी के शुरुआती वर्षों की कहानी सुनते हुए यह अहसास हुआ कि इतिहास हमेशा बड़ी घटनाओं से नहीं बनता। कभी-कभी वह एक छोटे से आश्रम, कुछ लोगों के सामूहिक जीवन और एक विचार से शुरू होता है।

गांधी का चरखा और हाई-स्पीड रेल …

और फिर वही यात्रा हमें उस गुजरात में ले आई, जहां आज करोड़ों रुपये की परियोजनाएं और वैश्विक वित्तीय संस्थान भविष्य की इबारत लिख रहे हैं।
एक ही धरती पर गांधी का चरखा भी था और हाई-स्पीड रेल की तकनीक भी।शायद गुजरात को समझने की पहली कुंजी यहीं मिल गई थी।

आनंद : दूध की बूंदों में छिपी एक बड़ी कहानी

आनंद में अमूल की कहानी सुनते हुए पत्रकारों के बीच सवाल-जवाब का सिलसिला कुछ अलग ही था। यहां कोई बड़ी-बड़ी आर्थिक शब्दावली नहीं थी।

बात थी दूध की, पशुपालक की, गांव की और उस भरोसे की, जिसने एक सहकारी आंदोलन को देश के सबसे पहचानने योग्य ब्रांडों में बदल दिया।

डॉ. प्रीति शुक्ला से संवाद के दौरान अमूल के विस्तार और नेटवर्क की जानकारी मिली तो एक बात साफ हुई—किसी ब्रांड की असली ताकत केवल उसके उत्पाद में नहीं होती। उसकी ताकत उस व्यवस्था में होती है, जो हजारों-लाखों लोगों को उससे जोड़ती है।

अमूल की कहानी सुनते हुए शायद कई पत्रकारों के मन में अपने-अपने गांव और वहां के दूध उत्पादक परिवारों की तस्वीर भी उभरी होगी।

गुजरात की इस यात्रा में यह महसूस हुआ कि विकास का अर्थ केवल बड़ी इमारतें नहीं हैं। कभी-कभी वह किसी किसान के घर की रसोई में भी दिखाई देता है।

लोथल : इतिहास की मिट्टी से उठती समुद्र की खुशबू

लोथल पहुंचने पर यात्रा जैसे अचानक बहुत पीछे चली गई।
सामने आधुनिक भारत था, लेकिन जमीन के भीतर और इतिहास की परतों में हजारों साल पुरानी दुनिया सांस ले रही थी।

करीब 4,500 वर्ष पुरानी समुद्री विरासत की कहानी सुनते हुए यह कल्पना करना रोमांचक था कि जिस भारत को आज हम बंदरगाहों, समुद्री व्यापार और ब्लू इकॉनमी की बात करते सुन रहे हैं, उसके समुद्री संबंध कितने पुराने हैं।

लोथल में विकसित हो रहा राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर इसी समृद्ध विरासत को आधुनिक तरीके से सामने लाने का प्रयास है।

यहां इतिहास केवल संग्रहालय की वस्तु बनकर नहीं रहता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा, शोध, पर्यटन और समुद्री चेतना का माध्यम बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है।

लोथल से लौटते हुए शायद सबसे स्वाभाविक सवाल यही था—
क्या हम सचमुच नए भारत का निर्माण कर रहे हैं, या इतिहास में कहीं बहुत पीछे छूटे अपने ही पुराने भारत को नए रूप में फिर से खोज रहे हैं ?

जब गुजरात की सड़क पर भविष्य दौड़ता दिखाई दिया

हाई-स्पीड रेल परियोजना की चर्चा में आंकड़े थे, लेकिन उन आंकड़ों के पीछे एक रोमांच भी था…

सैकड़ों किलोमीटर लंबे वायाडक्ट, नदी पुल, पहाड़ों को काटती सुरंगें और भविष्य की रेल के लिए तैयार होता विशाल ढांचा—यह सब सुनते हुए मन में एक ही तस्वीर बनती थी।

एक दिन यही रास्ता खुलेगा और ट्रेन इतनी तेजी से गुजरेगी कि शायद आज की ये सुरंगें और पुल पीछे छूटते हुए सिर्फ कुछ सेकंड में दिखाई देंगे।

लेकिन उस गति के पीछे आज हजारों इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक अपना समय और कौशल लगा रहे हैं।

वलसाड की सुरंग से लेकर पालघर के पर्वतीय क्षेत्रों तक निर्माण की प्रगति ने यह दिखाया कि भविष्य अचानक नहीं आता। उसे पहले जमीन के नीचे, फिर जमीन के ऊपर और अंततः लोगों की जिंदगी में बनाया जाता है।

सैनंद : जब भारत चिप बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है

गुजरात की यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव सैनंद था, जहां से भारत के उभरते सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र की तस्वीर सामने आई।

सेमीकंडक्टर आज केवल एक औद्योगिक उत्पाद नहीं है। मोबाइल फोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा तकनीक और आधुनिक संचार व्यवस्था तक—लगभग हर महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र इसकी उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा है।

सैनंद में विकसित हो रही सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षमता ने यह संकेत दिया कि भारत अब केवल वैश्विक तकनीकी उत्पादों का बाजार बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उनकी मूल तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भी अपनी मजबूत जगह बनाना चाहता है।

यहां खड़े होकर गुजरात की यात्रा का एक और सूत्र समझ में आया—जिस प्रदेश ने कभी दूध की बूंदों को सहकारिता की ताकत में बदला, वही अब अत्याधुनिक तकनीक के क्षेत्र में अपनी नई पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है।

GIFT City : जहां बातचीत अचानक डॉलर में होने लगती है

और फिर आया GIFT City का पड़ाव। यहां पहुंचते ही यात्रा की भाषा बदल गई। अब बात दूध की नहीं, डॉलर की थी। अब चर्चा गांव की सहकारिता से निकलकर वैश्विक पूंजी, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, बीमा, पूंजी बाजार, ट्रेजरी, विमान एवं पोत लीजिंग, व्यापार वित्त और सतत वित्त तक पहुंच गई थी…

GIFT City के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अविचल खेरा और महाप्रबंधक जया चतुर्वेदी से संवाद के दौरान GIFT City के विकास और भविष्य की संभावनाओं की तस्वीर सामने आई। भारत से जुड़े अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कारोबार को भारत की जमीन पर वापस लाने की अवधारणा इस पूरे विकास की केंद्रीय सोच के रूप में सामने आई।

कभी भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय गतिविधियों के लिए सिंगापुर, दुबई, मॉरीशस या अन्य केंद्रों की ओर देखना पड़ता था। अब भारत अपने भीतर ऐसा मंच तैयार कर रहा है, जहां वैश्विक वित्तीय गतिविधियों के लिए आवश्यक ढांचा उपलब्ध हो।

GIFT City में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र के रूप में विकसित क्षेत्र में बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, पूंजी बाजार, बीमा, ट्रेजरी, विमान एवं पोत लीजिंग तथा अन्य वित्तीय सेवाओं से जुड़ी गतिविधियां आकार ले रही हैं।

एक पत्रकार ने सवाल पूछा और चर्चा थोड़ी देर के लिए कराधान और रोजगार तक पहुंच गई।
तभी यह बात सामने आई कि किसी वित्तीय केंद्र का योगदान केवल उस कर से नहीं मापा जाता, जो वह आज जमा करता है।

सवाल यह भी है कि वह कितनी आर्थिक गतिविधि देश में वापस लाता है, कितने रोजगार पैदा करता है और कितनी प्रतिभा को देश में रोकता है।यहीं GIFT City एक इमारत से बढ़कर एक विचार बन जाती है।

IFSCA : वैश्विक वित्त को मिला एकीकृत नियामकीय आधार

GIFT City की इमारतों और वित्तीय गतिविधियों के पीछे एक महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था भी काम कर रही है—अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (International Financial Services Centres Authority—IFSCA)।

IFSCA के कार्यकारी निदेशक (विकास) डॉ. दीपेश शाह के साथ संवाद ने इस व्यवस्था के महत्व को समझने का अवसर दिया।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र को वैश्विक पूंजी के ‘इनबाउंड और आउटबाउंड गेटवे’ के रूप में समझाया गया। अर्थात दुनिया से पूंजी भारत में आए और भारत से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय गतिविधियां वैश्विक बाजारों से जुड़ें—यह इसकी मूल अवधारणा है।

GIFT International Financial Services Centre में अधिसूचित विदेशी मुद्राओं में वित्तीय लेन-देन की सुविधा और एकीकृत नियामकीय व्यवस्था इसे घरेलू वित्तीय व्यवस्था से अलग विशिष्टता प्रदान करती है।

प्रतिभा का भारत में रहना…

लेकिन इस संवाद में एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आया—प्रतिभा का भारत में रहना…

भारत के युवा यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर के वित्तीय और तकनीकी अवसर देश में ही पा सकें, तो वैश्विक अनुभव और भारतीय प्रतिभा का लाभ देश के भीतर ही मिल सकता है। इस दृष्टि से GIFT International Financial Services Centre केवल वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य के रोजगार और कौशल का संभावित केंद्र भी है।

यात्रा के इस पड़ाव ने यह समझने में मदद की कि विकसित भारत का सपना केवल पूंजी जुटाने से पूरा नहीं होगा। इसके लिए पूंजी के साथ प्रतिभा, तकनीक और संस्थागत क्षमता भी देश में विकसित करनी होगी।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी : यात्रा का अंतिम दृश्य, लेकिन कहानी का नहीं…

पांच दिनों की यात्रा के अंतिम हिस्से में एकतानगर स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पहुंचना कुछ अलग ही अनुभव था।

इस बार आसमान पर बादल थे और बारिश भी साथ चल रही थी। सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा के सामने खड़े होकर कैमरे क्लिक हो रहे थे, लोग तस्वीरें ले रहे थे, लेकिन कुछ क्षण ऐसे भी आए जब सब जैसे चुप हो गए…

शायद इसलिए कि पांच दिनों में देखी गई सारी तस्वीरें अचानक एक साथ सामने आ गई थीं।

गांधी का आश्रम।
अमूल का किसान।
लोथल का समुद्र।
बुलेट ट्रेन की सुरंग।
सैनंद का सेमीकंडक्टर।
GIFT City की चमक।
और सामने खड़े सरदार पटेल।
एक क्षण लगा कि यात्रा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—

भारत की कहानी केवल अतीत की कहानी नहीं है और केवल भविष्य की भी नहीं। यह उन दोनों के बीच पुल बनाने की कहानी है।

वापसी में साथ रह गई गुजरात की एक तस्वीर…

जब वापसी का समय आया, तो गुजरात शायद पहले से थोड़ा अलग दिखाई दे रहा था।
अब सड़क के किनारे गुजरते खेत केवल खेत नहीं थे। उनमें अमूल की कहानी दिखाई देती थी।
दूर जाती ट्रेन केवल ट्रेन नहीं थी। उसमें हाई-स्पीड रेल का भविष्य दिखाई देता था।

शहर की चमकती इमारतें केवल इमारतें नहीं थीं। उनमें GIFT City की वैश्विक महत्वाकांक्षा दिखाई देती थी।

और किसी पुराने स्मारक की दीवार केवल इतिहास नहीं थी। उसमें लोथल और साबरमती की स्मृतियां सांस ले रही थीं।

पांच दिन गुजर चुके थे।
बारिश भी थम गई थी।
लेकिन शायद यात्रा की सबसे अच्छी बात यही थी कि मन के भीतर कुछ सवाल अब भी बरस रहे थे…

क्या भारत अपनी प्राचीन समुद्री शक्ति को आधुनिक समुद्री अर्थव्यवस्था में बदल पाएगा ?

क्या गांव की सहकारिता से लेकर वैश्विक वित्त तक विकास की यह यात्रा देश के हर हिस्से तक पहुंचेगी ?

क्या GIFT City भारत को वैश्विक वित्तीय मानचित्र पर वह स्थान दिला पाएगी, जिसकी कल्पना की जा रही है ?

और क्या आने वाला भारत अपनी विरासत को बचाते हुए उतनी ही तेजी से आगे बढ़ पाएगा, जितनी तेजी से उसकी हाई-स्पीड ट्रेन दौड़ने वाली है ?

शायद इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के पास हैं।
लेकिन गुजरात की इस यात्रा ने एक बात जरूर दिखा दी—
भविष्य कहीं दूर खड़ा हमारा इंतजार नहीं कर रहा…

वह गुजरात की सड़कों पर निर्माणाधीन है, खेतों में पनप रहा है, प्रयोगशालाओं में आकार ले रहा है, सुरंगों में रास्ता बना रहा है और GIFT City की ऊंची इमारतों में अपनी पहली मंजिलें तलाश रहा है।

और इसी वजह से यह पांच दिन की यात्रा खत्म होकर भी खत्म नहीं हुई।

क्योंकि गुजरात से लौटते समय साथ केवल यादें नहीं आतीं—कुछ सवाल भी लौटते हैं। और वही सवाल किसी यात्रा को एक कहानी बना देते हैं…