Share This Article रायपुर, 20 अगस्त 2026/ ETrendingIndia / सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पुलिस सामान्य तौर पर गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 के तहत भ्रूण के लिंग का पता लगाने या लिंग चयन से जुड़े अपराधों की जांच नहीं कर सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत मामलों की मुख्य जांच की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं, बल्कि कानून के तहत अधिकृत प्राधिकरण की होगी। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए पुलिस को जांचकर्ता नहीं बनाया जाना चाहिए और जहां तक संभव हो, ऐसे मामलों में पुलिस की मदद लेने से भी बचना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह कानून तकनीकी प्रकृति के मामलों से जुड़ा है, जिनमें चिकित्सकीय जानकारी और विशेष संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 17(4) के तहत अधिकृत प्राधिकरण को कानून के तहत अपराधों की शिकायत दर्ज कराने और उनकी जांच करने की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से दी गई है। इसलिए इस कानून के तहत अपराधों की मुख्य जांच पुलिस द्वारा नहीं की जा सकती।पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण से भी सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि पुलिस पीसीपीएनडीटी अधिनियम के उल्लंघन की जांच नहीं कर सकती और न ही इस कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज कर सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे मामलों में पुलिस की कोई भूमिका नहीं होगी। यदि कानून के तहत अधिकृत प्राधिकरण को किसी कार्रवाई में पुलिस की सहायता की आवश्यकता होती है, तो पुलिस सीमित और सहायक भूमिका निभा सकती है।अदालत ने कहा कि संबंधित प्रावधानों और नियमों के अनुसार जहां तक संभव हो, पुलिस की कार्रवाई से बचना चाहिए। पुलिस इस कानून के तहत मुख्य जांच एजेंसी नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की जांच पर लगाई गई यह सीमा केवल पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत आने वाले अपराधों तक सीमित है। इससे पुलिस की सामान्य जांच शक्तियां प्रभावित नहीं होंगी। यदि किसी मामले में भारतीय दंड कानून या किसी अन्य लागू कानून के तहत अलग अपराध बनता है, तो पुलिस उस अपराध की जांच और मुकदमा चलाने की कार्रवाई कर सकती है। पीसीपीएनडीटी अधिनियम का उद्देश्य गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन और भ्रूण के लिंग का पता लगाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। कानून के तहत प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकने और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई पर अंकुश लगाने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से इस कानून के तहत जांच की जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है। अब संबंधित मामलों में अधिकृत प्राधिकरण मुख्य भूमिका निभाएगा, जबकि जरूरत पडऩे पर पुलिस केवल सहायता प्रदान कर सकेगी। Share This Article Post navigation सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के श्रम कानून के लिए 1978 की इंडस्ट्री की परिभाषा को खारिज किया