Share This Article नई दिल्ली, 11 सितंबर 2026/ IND-RUS : भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को लेकर एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। BRICS सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के बीच दोनों देशों के बीच संभावित रक्षा समझौतों पर चर्चा अहम मानी जा रही है। S-400 की अतिरिक्त स्क्वाड्रन और Su-57 लड़ाकू विमानों के प्रस्ताव के साथ रूस का Product 177S इंजन भी चर्चा के केंद्र में है। खास बात यह है कि रूस इस इंजन को केवल Su-57 के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के Su-30MKI में इस्तेमाल होने वाले AL-31F/AL-31FP परिवार के संभावित विकल्प के रूप में भी पेश कर सकता है। यदि तकनीक हस्तांतरण और भारत में स्थानीय उत्पादन का रास्ता खुलता है, तो इसका असर भारत के भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है। AMCA के लिए इंजन क्यों बना सबसे बड़ा सवाल? भारत का Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA प्रोजेक्ट देश के सबसे महत्वाकांक्षी स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में शामिल है। इसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ मल्टी-रोल फाइटर के तौर पर विकसित किया जा रहा है, जिसमें आधुनिक एवियोनिक्स, स्टील्थ क्षमता, सुपरसोनिक प्रदर्शन और सुपरक्रूज जैसी तकनीकों को शामिल करने की योजना है। लेकिन AMCA की सफलता के लिए सबसे अहम जरूरतों में से एक ऐसा इंजन है, जो पर्याप्त थ्रस्ट के साथ विश्वसनीयता, कम ईंधन खपत, बेहतर ताप प्रबंधन और लंबे समय तक संचालन की क्षमता दे सके। यही वजह है कि AMCA के इंजन को लेकर भारत लगातार विदेशी तकनीकी साझेदारों के साथ विकल्प तलाश रहा है। क्या है रूस का Product 177S? Product 177S को रूस के अगली पीढ़ी के हाई-थ्रस्ट इंजन परिवार से जोड़कर देखा जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों में इसकी अधिकतम थ्रस्ट क्षमता करीब 14,500 kgf यानी लगभग 142 kN बताई गई है। हालांकि, अंतिम उत्पादन कॉन्फिगरेशन और वास्तविक प्रदर्शन को लेकर आधिकारिक स्तर पर पूरी जानकारी सामने आना अभी बाकी है। यदि बताई जा रही थ्रस्ट क्षमता वास्तविक उत्पादन इंजन में हासिल होती है और इसे AMCA की जरूरतों के अनुरूप सफलतापूर्वक एकीकृत किया जाता है, तो यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। ज्यादा थ्रस्ट से AMCA को क्या फायदा? किसी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए केवल अधिक इंजन शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती, लेकिन हाई-थ्रस्ट इंजन विमान के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ज्यादा थ्रस्ट से त्वरण, ऊंचाई हासिल करने की क्षमता और युद्धाभ्यास में फायदा मिल सकता है। इसके अलावा, अलग-अलग हथियार और ईंधन कॉन्फिगरेशन के बावजूद विमान के प्रदर्शन को बनाए रखने में भी पर्याप्त इंजन शक्ति मददगार हो सकती है। हालांकि इंजन का वजन, आकार, ईंधन दक्षता, विश्वसनीयता और एयरफ्रेम के साथ उसका एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। सुपरक्रूज और स्टील्थ के लिए सिर्फ ताकत काफी नहीं AMCA जैसे विमान में सुपरक्रूज हासिल करने के लिए शक्तिशाली इंजन के साथ एयरोडायनामिक डिजाइन, विमान का वजन, एयर इनटेक और ड्रैग भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल अधिक थ्रस्ट होने से सुपरक्रूज की गारंटी नहीं मिलती। इसी तरह स्टील्थ क्षमता भी सिर्फ इंजन या नोजल पर निर्भर नहीं करती। इंजन इंस्टॉलेशन, एयरफ्रेम का डिजाइन, इंफ्रारेड सिग्नेचर और एग्जॉस्ट सिस्टम समेत कई तकनीकों का सामंजस्य जरूरी होता है। अगर 177S को AMCA के लिए चुना जाता है तो इन सभी पहलुओं का इंजीनियरिंग स्तर पर समाधान करना होगा। Su-30MKI के लिए भी खुल सकता है नया रास्ता रूस के प्रस्ताव की एक और अहम संभावना भारतीय वायुसेना के Su-30MKI बेड़े से जुड़ी है। इन विमानों में AL-31FP परिवार के इंजन इस्तेमाल होते हैं। अगर Product 177S को भारतीय Su-30MKI के लिए सफलतापूर्वक अनुकूलित किया जा सके, तो मौजूदा लड़ाकू विमानों की क्षमता और परिचालन जीवन बढ़ाने का विकल्प सामने आ सकता है। हालांकि इसके लिए इंजन के आकार, वजन, एयरफ्रेम एकीकरण, सॉफ्टवेयर, एयर इनटेक और अन्य प्रणालियों के साथ इसकी अनुकूलता को साबित करना जरूरी होगा। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सबसे बड़ा गेमचेंजर भारत के लिए रूस के प्रस्ताव का सबसे आकर्षक पहलू केवल इंजन का थ्रस्ट नहीं, बल्कि संभावित तकनीक हस्तांतरण और स्थानीय उत्पादन हो सकता है। अगर भारत को इंजन की महत्वपूर्ण तकनीक और निर्माण क्षमता हासिल होती है, तो इससे देश के एयरोस्पेस उद्योग को लंबी अवधि में बड़ा फायदा मिल सकता है। भारत पहले से ही लड़ाकू विमान इंजन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में किसी विदेशी इंजन निर्माता के साथ गहरा तकनीकी सहयोग भविष्य में स्वदेशी इंजन विकसित करने की क्षमता को भी मजबूत कर सकता है। GE, Safran और Rolls-Royce भी दौड़ में AMCA के लिए भारत के सामने केवल रूसी विकल्प ही नहीं है। अमेरिकी GE Aerospace, फ्रांस की Safran और ब्रिटेन की Rolls-Royce जैसी कंपनियां भी भारतीय लड़ाकू विमान इंजन कार्यक्रमों को लेकर महत्वपूर्ण संभावित साझेदार रही हैं। भारत के सामने चुनौती सिर्फ सबसे शक्तिशाली इंजन चुनने की नहीं है। नई दिल्ली को ऐसा विकल्प चाहिए जिसमें तकनीक हस्तांतरण, भारत में निर्माण, विश्वसनीयता, लागत और दशकों तक मिलने वाला सपोर्ट एक साथ सुनिश्चित हो। रूसी इंजन के सामने ये तीन बड़ी चुनौतियां Product 177S को लेकर उत्साह के बावजूद भारत को कई अहम सवालों के जवाब तलाशने होंगे। सबसे पहला मुद्दा विश्वसनीयता और मेंटेनेंस का है। भारतीय वायुसेना को रूसी मूल के विमानों और इंजनों के संचालन का लंबा अनुभव है, लेकिन किसी नए इंजन की वास्तविक विश्वसनीयता उसके बड़े पैमाने पर परिचालन के बाद ही स्पष्ट होगी। दूसरी चुनौती उत्पादन और डिलीवरी की है। यदि इंजन अभी विकास या परीक्षण के चरण में है, तो बड़े पैमाने पर उत्पादन तक पहुंचने में समय लग सकता है। तीसरा और सबसे अहम सवाल तकनीक हस्तांतरण की वास्तविक सीमा का होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसे सिर्फ इंजन असेंबल करने की क्षमता मिले या डिजाइन, निर्माण और रखरखाव से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीक भी देश में उपलब्ध हो। भारत के लिए इंजन का फैसला क्यों ऐतिहासिक होगा? AMCA के लिए इंजन का चुनाव महज एक रक्षा खरीद नहीं है। यह भारत की अगले कई दशकों की एयरोस्पेस क्षमता और आत्मनिर्भरता को प्रभावित कर सकता है। यदि Product 177S अपेक्षित प्रदर्शन, विश्वसनीयता और तकनीक हस्तांतरण की शर्तों पर खरा उतरता है, तो रूस का प्रस्ताव भारत के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। फिलहाल असली नजर इस बात पर रहेगी कि भारत और रूस के बीच बातचीत में 177S को लेकर क्या तकनीकी और औद्योगिक प्रस्ताव सामने आता है और क्या रूस भारत में इसके स्थानीय उत्पादन के लिए वास्तविक तकनीक हस्तांतरण को तैयार होता है। Share This Article Post navigation SIR Notice : महेश बाबू से साइना नेहवाल तक, इन बड़े नामों को SIR नोटिस, जानिए क्यों भेजा गया चुनाव आयोग का नोटिस