Share This Article सीहोर, 13 सितंबर 2026/ Sehore Chintaman Ganesh Temple : मध्य प्रदेश के सीहोर में भगवान श्री गणेश का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं के बीच कई रोचक मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं। जिला मुख्यालय से कुछ दूरी पर गोपालपुर गांव में स्थित चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर की प्रतिमा करीब 2000 वर्ष पुरानी बताई जाती है। मान्यता है कि यह प्रतिमा सीवन नदी से प्राप्त हुई थी और आज भी जमीन में आधी धंसी हुई है। इस मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीन प्रतिमा ही नहीं है। यहां हर साल मंदिर का नाम और व्यवस्थापक बदल जाता है। इसके पीछे मंदिर और करीब तीन एकड़ जमीन से जुड़ा लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद बताया जाता है। कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार दोनों परिवार बारी-बारी से एक-एक वर्ष मंदिर की व्यवस्था संभालते हैं। सीवन नदी से मिला था कमल, फिर बनी गणेश प्रतिमा? स्थानीय मान्यता के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य सीवन नदी से कमल के फूल के रूप में भगवान गणेश को रथ में लेकर जा रहे थे। सुबह होने पर रथ जमीन में धंस गया। इसी दौरान कमल का फूल गणेश प्रतिमा के रूप में बदलने लगा और प्रतिमा भी जमीन में धंस गई। कहा जाता है कि बाद में इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। आज भी प्रतिमा का कुछ हिस्सा जमीन के भीतर है। देश की चार स्वयंभू गणेश प्रतिमाओं में एक होने की मान्यता चिंतामन सिद्ध गणेश को लेकर यह मान्यता भी प्रचलित है कि देश में भगवान गणेश की चार प्रमुख स्वयंभू प्रतिमाएं हैं। इनमें सीहोर के चिंतामन गणेश के अलावा राजस्थान के रणथंभौर, उज्जैन और गुजरात के सिद्धपुर के गणेश मंदिरों का उल्लेख किया जाता है। हालांकि इन मान्यताओं को धार्मिक और स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में देखा जाता है। मन्नत पूरी होने पर सीधा स्वास्तिक बनाने की परंपरा मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी एक और दिलचस्प परंपरा देखने को मिलती है। लोग मंदिर की दीवार पर सिंदूर से उल्टा स्वास्तिक बनाकर अपनी मन्नत मांगते हैं। कई श्रद्धालु मंदिर की जालियों पर धागा भी बांधते हैं। मान्यता के अनुसार मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु दोबारा मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और सीधा स्वास्तिक बनाकर भगवान गणेश का आभार जताते हैं। कभी कच्चे रास्ते से पहुंचते थे श्रद्धालु करीब चार दशक पहले तक मंदिर के आसपास जंगल और कुछ कच्चे मकान ही हुआ करते थे। मंदिर तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता भी नहीं था। श्रद्धालु पैदल या शहर से तांगे के जरिए यहां पहुंचते थे। गणेश चतुर्थी के दौरान यहां तीन दिन का मेला भी लगता था। समय के साथ मेले और दर्शन से जुड़ी पुरानी व्यवस्थाओं में बदलाव आया। हर साल क्यों बदल जाता है मंदिर का नाम? मंदिर और इसकी जमीन को लेकर दो परिवारों के बीच विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। फिलहाल न्यायालय की व्यवस्था के तहत दोनों परिवार बारी-बारी से एक-एक वर्ष मंदिर की व्यवस्था संभालते हैं। यही वजह बताई जाती है कि व्यवस्थापक बदलने के साथ मंदिर का नाम भी बदल जाता है। आस्था के कारण लगातार पहुंचते हैं श्रद्धालु समय के साथ चिंतामन गणेश मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई। गणेश चतुर्थी के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी प्राचीन मान्यताएं, जमीन में धंसी प्रतिमा और मन्नत से जुड़ी परंपराएं इसे श्रद्धालुओं के लिए खास बनाती हैं। मंदिर की प्राचीनता और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं की अपनी अलग कहानी है, लेकिन इतना जरूर है कि यहां पहुंचने वाले भक्तों की आस्था आज भी लगातार बनी हुई है। Share This Article Post navigation डच जॉब ऑफर के बाद बिट्टू तबाही का बड़ा कदम, अब किस राज्य की नदी साफ करेंगे? Ladli Behna Yojana : CM मोहन यादव ने जारी की 40वीं किस्त, 1.25 करोड़ बहनों के खाते में पहुंचे ₹1,835 करोड़, 50 लाख पट्टेदारों को फ्री रजिस्ट्री का ऐलान