Share This Article रायपुर, 05 नवंबर 2026 / ETrendingIndia / छत्तीसगढ़ के पारम्परिक बाँस गीतों में बाँस वादन केअंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार विक्रम यादव का गत दिनों देहावसान हो गया. श्री यादव छत्तीसगढ़ की विलुप्त होती बाँस वादन की कला परम्परा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाने वाले एक प्रतिभा संपन्न और समर्पित लोक कलाकार थे । उनकी यह कला यात्रा लगभग छह दशकों तक चली . वे 85साल के थे और राजनांदगांव जिले के ग्राम खैरा (रवेली)के निवासी थे । खैरा में ही पिछले हफ़्ते 29 अक्टूबर को उनका निधन हुआ। साकेत साहित्य परिषद सुरगी के अध्यक्ष ओम प्रकाश साहू ‘ अंकुर ‘ ने बताया कि स्वर्गीय श्री विक्रम यादव ने वर्ष 1971 में छत्तीसगढ़ के अंतरराष्ट्रीय रंगकर्मी हबीब तनवीर के ‘नया थिएटर’ से जुड़कर रायपुर, दिल्ली, भोपाल, कलकत्ता, दुर्गापुर, शोलापुर, उत्तर प्रदेश, पुणे, हरियाणा, कोल्हापुर, सतारा, मुंबई और अहमदाबाद सहित देश के विभिन्न स्थानों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने विदेशों में भी अपनी बाँस वादन कला की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की इस विलुप्त होती लोककला का गौरव बढ़ाया । राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के समक्ष भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया था । उन्होंने वर्ष 2007 में रंगकर्मी अनूप रंजन पांडेय के ‘बस्तर बैंड’ से जुड़कर देश-विदेश में अपनी सांस्कृतिक सहभागिता को निरंतर आगे बढ़ाया। स्वर्गीय श्री विक्रम यादव की सुदीर्घ कला-साधना के लिए उन्हें वर्ष 2007 में युवा कुर्मी मित्र मंडल, भिलाई द्वारा ‘भुइयाँ सम्मान’ और मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2018 में प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय तुलसी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 में गुरुघासीदास लोक कला महोत्सव, ककरेल तथा भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। अपनी सुदीर्घ कला-यात्रा के दौरान स्वर्गीय श्री यादव ने लोक मड़ई, मंदराजी महोत्सव, चक्रधर समारोह, अंतरराष्ट्रीय महाउर कला महोत्सव, जयपुर लोकरंग महोत्सव एवं नया थिएटर, भोपाल जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर बाँस वादन कला से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई । Share This Article Post navigation अयोध्या दीपोत्सव: देशभर से आए लोक कलाकार बिखेरेंगे रंग, सांस्कृतिक एकता और परंपराओं का अनूठा संगम