Korba Special: The forest’s ‘white gold’ takes the market by storm! ‘Sarai Boda’ emerges with the first rains—the price will leave you amazed!
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कोरबा, 18 जून 2026/ Korba Special: The forest’s ‘white gold’ takes the market by storm! ‘Sarai Boda’ emerges with the first rains—the price will leave you amazed!

Korba Special : पहली बारिश की फुहार और बढ़ती उमस के साथ ही जंगलों में एक ऐसा प्राकृतिक खजाना जन्म लेने लगता है, जिसकी कीमत कई बार सब्जियों ही नहीं, बल्कि कई खाद्य पदार्थों को भी पीछे छोड़ देती है। हम बात कर रहे हैं सरई बोड़ा की, जिसे स्थानीय लोग जंगल का ‘सफेद सोना’ भी कहते हैं। साल के जंगलों से निकलकर बाजार तक पहुंचने वाला यह दुर्लभ फफूंद इन दिनों लोगों की पहली पसंद बना हुआ है।

सब्जी बाजार में जहां आमतौर पर टमाटर, भिंडी और अन्य मौसमी सब्जियां चर्चा में रहती हैं, वहीं इन दिनों सरई बोड़ा ने सबसे महंगी और सबसे अधिक मांग वाली वन उपज का दर्जा हासिल कर लिया है। इसकी कीमत लगातार ऊंची बनी हुई है, क्योंकि मांग के मुकाबले उपलब्धता बेहद कम है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी खेती संभव नहीं है और यह पूरी तरह प्रकृति की मेहरबानी पर निर्भर करता है।

साल जंगलों की गोद में तैयार होता है सरई बोड़ा

मशरूम परिवार से संबंध रखने वाला सरई बोड़ा अपनी बनावट और उत्पत्ति के कारण बेहद अनोखा माना जाता है। यह मुख्य रूप से साल वृक्षों वाले जंगलों में पाया जाता है। आदिवासी अंचलों में यह केवल स्वादिष्ट सब्जी ही नहीं, बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।

विशेषज्ञों के अनुसार मानसून की शुरुआती बारिश के बाद जब वातावरण में नमी और उमस बढ़ती है, तब साल वृक्षों से निकलने वाला एक विशेष द्रव्य जमीन पर गिरकर सूखी पत्तियों के नीचे फंगस का रूप लेने लगता है। यही फंगस धीरे-धीरे विकसित होकर सरई बोड़ा के रूप में सामने आता है।

सिर्फ 35 दिनों का मेहमान

सरई बोड़ा की उपलब्धता बेहद सीमित होती है। जून और जुलाई के दौरान लगभग 30 से 35 दिनों तक ही यह जंगलों में मिलता है। यही वजह है कि इसकी मांग हमेशा आपूर्ति से कहीं अधिक रहती है। चूंकि यह प्राकृतिक रूप से विकसित होने वाला फफूंद है, इसलिए इसका उत्पादन नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

खेती क्यों नहीं हो सकती?

विशेषज्ञ बताते हैं कि सरई बोड़ा का विकास विशेष प्राकृतिक परिस्थितियों और साल वृक्षों के पारिस्थितिक तंत्र पर निर्भर करता है। अब तक इसके व्यावसायिक उत्पादन या खेती की कोई सफल तकनीक विकसित नहीं हो सकी है। यही कारण है कि इसकी उपलब्धता पूरी तरह जंगल और मौसम पर निर्भर रहती है।

पोषण का खजाना

अनुसंधानों में सरई बोड़ा को पोषण तत्वों का भंडार माना गया है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और विभिन्न खनिज तत्व पाए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कुपोषण दूर करने, पाचन तंत्र को मजबूत बनाने तथा शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में सहायक हो सकता है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर के फॉरेस्ट्री वैज्ञानिक अजीत विलियम्स के अनुसार, सरई बोड़ा फफूंद की एक विशेष प्रजाति है जो साल वृक्षों से जुड़े प्राकृतिक तंत्र में विकसित होती है। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और खनिज तत्व पाए जाते हैं, जिससे इसे पोषण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जंगल से निकलकर बाजार तक पहुंचने वाला सरई बोड़ा केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि प्रकृति का ऐसा अनमोल उपहार है, जिसका इंतजार हर साल पहली बारिश के साथ शुरू हो जाता है।