Share This Article रिश्तों की डोर “चलो जल्दी से खीर बना लूं,बस भाई भाभी पहुँचते ही होंगे” सोचती हुई तारिणी रसोई की ओर बढ़ गई। नियत समय में छोटे भाई – भाई बहू,बड़े भाई – भाभी और भतीजे भी आ गए। सबको प्यार से राखी बांधती हुई तारिणी सोच रही थी “कितना भरा पूरा परिवार दिया है भगवान ने मुझे,भाई भाभी तो मानो उसे पलकों में बिठाकर रखते हैं। लाख लाख शुक्र है भगवान का।” भोजन के बाद सब बतियाने बैठ गए। हंसते बोलते कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। चाय पीकर अब सब जाने लगे। सबको विदा कर तारिणी अपने पति विपुल से बात करने लगी “कितना अच्छा लगता है ना विपुल,जब भैया भाभी आते हैं,कितना प्यार देते हैं मुझे।’ गर्व से तारिणी विपुल को निहार रही थी। “हां तारिणी तुम बहुत सौभाग्यशाली हो तुम्हारी भाभियाँ तुमसे कटी कटी नहीं रहती,प्यार से पेश आतीं है। काश मेरी बहन भी इतनी ही खुश होती राखी के दिन।” विपुल ने धीरे से उदास स्वर में कहा और आँखों में आंसू लिए तारिणी की ओर देखने लगा। विपुल का चेहरा देखते ही तारिणी एक क्षण को ठिठक गई,सोचने लगी “आज विपुल की कलाई मेरी जिद के कारण सूनी है” इसी शहर में रहती है उसकी ननद विभा। पर ननद का अपने घर में हस्तक्षेप उसे बिल्कुल पसंद नहीं आया था। बात बात में ननद की सीख उसे बुरी लगती थी। एक बार तारिणी ने जोर से विभा को कह दिया था”आप क्यों घुस आतीं हैं बार बार हमारे बीच,आप अपना घर देखिये हम अपना” विभा ने प्यार से कहा था”तुम छोटी सी हो तारिणी, मां बाबूजी के बाद मैने ही विपुल को बड़ा किया है। बस तुम दोनों को छोटी छोटी समझाइश दे देती हूं क्योंकि विपुल को देती रहती थी ना।” पर तारिणी ने उसे अपना दुश्मन ही मान लिया था। एक मौके में तो तारिणी ने विभा का घर आना भी बंद करवा दिया,और विपुल के कान भी भर दिए। दोनों भाई बहन ने एक दूसरे के घर जाना बंद कर दिया था। आज विपुल की आंखों में आंसू देख तारिणी सोचने लगी “दीदी इतनी बुरी भी नहीं है,प्यार करती है हम दोनों को इसीलिए तो समझाइश देती थी। मैने गलत किया विपुल को उसकी दीदी से दूर कर। तारिणी ने कुछ क्षण सोचा और तैयार होने लगी “विपुल तैयार हो जाओ हम एक जगह चल रहे हैं” उसने कहा। विभा के लिए एक सुंदर सी नई साड़ी निकाली अपनी अलमारी से,उससे मैचिंग चूड़ी और मिठाईया, राखी सभी कुछ रख लिया। “आज कार मैं चलाऊंगी विपुल” कहती हुई वह ड्राइविंग सीट पर बैठ गई। कार विभा के घर की ओर बढ़ रही थी। विपुल आश्चर्य से तारिणी को देखने लगा। कार जब विभा के घर के सामने रुकी तारिणी आगे चलने लगी। कॉल बेल बजाकर आवाज भी देने लगी “दीदी जल्दी आइये, देखिए कौन आया है।” विपुल की बहन ने दरवाजा खोला और भाई भाभी को देखकर रोने लगी। तारिणी ने बढ़कर ननद के पैर छुए और कहने लगी “दीदी मुझे माफ कर दीजिए,मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।” विभा ने दोनों को गले से लगा लिया। विभा ने भाई भाभी को राखी बांधी ,मिठाई खिलाई और कहने लगी “इस राखी में हमारी टूटती हुई रिश्तों की डोर और मजबूत हो गई।” तीनों के आँखो से खुशी के आंसू बहने लगे। सुरेखा गुप्ता, जुनवानी, भिलाई सुरेखा गुप्तापति श्री सूर्यकांत गुप्तापिता श्री दयाशंकर गुप्तामाता श्रीमती कुसुम गुप्ताएम ए राजनीति शास्त्रभारतीय स्टेट बैंक से अवकाश प्राप्तरुचि लघुकथा लेखनजुनवानी भिलाई छत्तीसगढ़ Share This Article Post navigation ।। बेवजह कुण्डी खट-खटाया करो ।।