रायपुर, 03 अगस्त 2026/ ETrendingIndia / उच्चतम न्यायालय ने लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं के कानूनी अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर किसी महिला को कानून की सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका संबंध पारंपरिक विवाह के रूप में नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मामले में आवश्यक कानूनी परिस्थितियां मौजूद हों, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के प्रावधान लिव-इन संबंधों से जुड़े मामलों में भी लागू हो सकते हैं।
न्यायालय ने कहा कि यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ पति-पत्नी की तरह रह रही है और उसे उस संबंध के दौरान मानसिक या शारीरिक प्रताडऩा अथवा क्रूरता का सामना करना पड़ता है, तो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उसे कानूनी राहत मिल सकती है।
केवल किसी संबंध को लिव-इन कहकर महिला के साथ हुए कथित उत्पीडऩ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए का उद्देश्य विवाहित महिलाओं को पति या उसके परिजनों द्वारा की जाने वाली क्रूरता और उत्पीडऩ से सुरक्षा प्रदान करना है।
हालांकि, लिव-इन संबंधों में इस प्रावधान के उपयोग का प्रश्न लंबे समय से न्यायिक विमर्श का विषय रहा है।
ऐसे मामलों में अदालत को संबंध की वास्तविक प्रकृति, दोनों पक्षों के साथ रहने की अवधि, उनके व्यवहार तथा लगाए गए आरोपों सहित सभी तथ्यों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना होगा।
न्यायालय की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब देश में लिव-इन संबंधों को लेकर सामाजिक और कानूनी स्तर पर व्यापक चर्चा हो रही है।
वर्तमान समय में अनेक लोग विवाह के बजाय साथ रहने का विकल्प चुन रहे हैं। ऐसे संबंधों में यदि किसी महिला को हिंसा, मानसिक उत्पीडऩ या गंभीर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो उसके अधिकारों और कानूनी संरक्षण को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में कानून लागू करने का निर्णय केवल संबंध के नाम या स्वरूप के आधार पर नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और उनका स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन आवश्यक है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक लिव-इन संबंध में स्वत: धारा 498ए लागू हो जाएगी, बल्कि यह तभी संभव होगा जब मामले के तथ्य और परिस्थितियां संबंधित कानूनी प्रावधानों की कसौटी पर खरी उतरें।
न्यायालय की इस टिप्पणी को महिलाओं के अधिकारों और उनकी कानूनी सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि किसी महिला की सुरक्षा और सम्मान को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर नहीं आंका जा सकता। हालांकि, प्रत्येक मामले में धारा 498ए लागू होगी या नहीं, इसका अंतिम निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही किया जाएगा।
