रायपुर, 28 जुलाई 2026/ ETrendingIndia / आंध्र प्रदेश का मदनपल्ले शहर स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, रीसाइक्लिंग, कंपोस्टिंग और जनभागीदारी के दम पर ‘शून्य अपशिष्ट शहर’ बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
रोज़ाना निकलने वाले 62 टन कचरे का अधिकांश हिस्सा अब संसाधन में बदल रहा है, जिससे प्रदूषण कम होने के साथ हरित विकास को भी बढ़ावा मिल रहा है।
62 टन कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन
शहर में प्रतिदिन लगभग 62 टन ठोस कचरा निकलता है।
स्रोत पर ही गीला, सूखा और घरेलू खतरनाक कचरा अलग किया जाता है।
इससे रीसाइक्लिंग और पर्यावरण अनुकूल निपटान आसान हुआ है।
गीले कचरे से बन रही जैविक खाद
प्रतिदिन करीब 15.5 टन गीले कचरे से कंपोस्ट और 3 टन कचरे से वर्मी-कंपोस्ट तैयार किया जा रहा है।
तैयार खाद का उपयोग शहर के पार्कों, उद्यानों और हरित क्षेत्रों में किया जा रहा है।
सूखा कचरा बन रहा संसाधन
पुनर्चक्रण योग्य कचरे को मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) भेजा जाता है।
गैर-रीसाइक्लेबल कचरे का उपयोग सीमेंट उद्योग में सह-प्रसंस्करण के लिए किया जा रहा है।
इससे लैंडफिल पर दबाव कम होने के साथ नगरपालिका को अतिरिक्त आय भी मिल रही है।
RRR केंद्र से बढ़ रही पुन: उपयोग की संस्कृति
ई-कचरा, पुराने कपड़े, खिलौने, किताबें और जूते एकत्र किए जाते हैं।
मरम्मत के बाद इन्हें जरूरतमंदों, मलिन बस्तियों और वृद्धाश्रमों में वितरित किया जाता है।
‘ वेस्ट-टू-आर्ट’ से सुंदर बने सार्वजनिक स्थल
बेकार टायर और अन्य कबाड़ से आकर्षक कलाकृतियां बनाई जा रही हैं।
शहर का ‘वेस्ट-टू-आर्ट पार्क’ पर्यावरण संरक्षण और नवाचार का प्रतीक बन गया है।
36 हजार टन पुराने कचरे का निस्तारण
बायो-माइनिंग और बायो-रिमेडिएशन के जरिए 36,512 मीट्रिक टन पुराने कचरे का निपटान किया गया।
लगभग 9.4 एकड़ भूमि मुक्त कराई गई, जिसमें से 5 एकड़ क्षेत्र को हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया गया।
अन्य शहरों के लिए प्रेरक मॉडल
मदनपल्ले का मॉडल दिखाता है कि वैज्ञानिक तकनीक, मजबूत प्रशासन और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से शहर ‘ज़ीरो डंप’ और ‘ज़ीरो लिटरिंग’ का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। यह पहल देश के अन्य शहरी निकायों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
