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रायपुर, 10 अक्टूबर 2026। ETrendingIndia / MP High Court जबलपुर ने कमलनाथ के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने संबंधी 2019 के कानून को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया।

इससे मध्य प्रदेश राज्य में ओबीसी आरक्षण फिर से 14 प्रतिशत हो गया है।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने 159 पृष्ठों के आदेश में भर्ती एजेंसियों को उन 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर अनारक्षित वर्ग से भरने का निर्देश दिया, जिन्हें आरक्षण बढ़ाने के कानून को चुनौती दिए जाने के बाद रोक दिया गया था।

मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने ने दस्तावेजों, आंकड़ों और तालिकाओं की जांच के बाद फैसला सुनाया।

उन्होंने कहा कि विवाद पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने को लेकर नहीं बल्कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने को लेकर था।

हाई कोर्ट ने देश के सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में दिए गए फैसलों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा पार करने को उचित ठहराने वाली कोई असाधारण परिस्थिति नहीं पाई।

हाई कोर्ट ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MP PSC), कर्मचारी चयन मंडल और अन्य भर्ती एजेंसियों को तीन महीने के भीतर रोके गए 13 प्रतिशत पदों के संबंध में आवश्यक कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया।

उल्लेखनीय है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 8 मार्च 2019 को अध्यादेश के जरिए ओबीसी आरक्षण बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। बाद में 14 अगस्त 2019 को इसे कानून का रूप दिया गया।

मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचने के बाद संबंधित याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई और फैसले के लिए वापस मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय भेज दिया गया था।

इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई पांच अगस्त 2026 को पूरी हुई थी और खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इस बीच, कांग्रेस की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि उनकी पार्टी 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए संघर्ष जारी रखेगी और उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगी।

उन्होंने भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर ओबीसी वर्ग के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया।


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