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 रायपुर, 18 अगस्त 2026 / ETrendingIndia / सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फांसी की सजा को खत्म करने और उसकी जगह कम दर्दनाक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, लेकिन सुधार की गुंजाइश बनाए रखी.


शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके फैसले से केंद्र सरकार को किसी एक्सपर्ट रिव्यू (विशेषज्ञ समीक्षा) का आदेश देने से नहीं रोका जा सकता जिसमें कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और क्रिमिनोलॉजी जैसे क्षेत्रों की मदद ली जाए. ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या सजा-ए-मौत का कोई दूसरा तरीका सजा पाने वाले की गरिमा बनाए रखते हुए अनावश्यक दर्द को बेहतर ढंग से कम कर सकता है.


यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनाया. फैसला सुनाते हुए जस्टिस मेहता ने कहा, हम इस बात से सहमत नहीं हैं कि सीआरपीसी की धारा 354 / बीएनएसएस की धारा 393(5) (फांसी के जरिए मौत की सजा से जुड़े प्रावधान) की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करने के लिए तीन जजों की बेंच (दीना मामले में) के फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने का कोई आधार बनता है.


जस्टिस मेहता ने आगे कहा कि मामले को खत्म करने से पहले, हम यह साफ करना चाहते हैं कि इस रिट याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि भविष्य में संवैधानिक जांच का रास्ता बंद हो गया है. अगर ऐसे ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित सबूत सामने आते हैं जिनसे यह साबित हो कि दीना मामले में जिस तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर फ़ैसला लिया गया था, वह बाद की घटनाओं के कारण काफी हद तक बदल गया है, तो भविष्य में संवैधानिक जांच हो सकती है.


बेंच ने कहा कि संविधान की व्याख्या ऑर्गेनिक है और इसे संवैधानिक राय के विकास और वैज्ञानिक ज्ञान में तरक्की दोनों के हिसाब से रिस्पॉन्सिव रहना चाहिए. बेंच ने कहा कि इस फैसले में शामिल कोई भी बात केंद्र सरकार को अगर वह इसे सही समझे, तो कानून, फोरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस, क्रिमिनोलॉजी और इससे जुड़े विषयों के स्पेशलिस्ट वाली एक एक्सपर्ट बॉडी के जरिए फांसी के मौजूदा तरीके का पूरा रिव्यू करने से नहीं रोकेगी.


ताकि यह जांचा जा सके कि क्या फांसी का कोई दूसरा तरीका, सजा पाए कैदियों की गरिमा बनाए रखते हुए बेवजह के दर्द को कम करने के संवैधानिक मकसद को बेहतर तरीके से पूरा करता है. बेंच ने कहा, ऊपर बताई गई बातों के साथ रिट याचिका खारिज की जाती है.
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सीनियर वकील ऋषि मल्होत्रा की 2017 में दायर एक याचिका पर आया था. इस याचिका में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (ष्टह्म्क्कष्ट, जिसे अब क्चहृस्स् से बदल दिया गया है) की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी. इसमें मौत होने तक फांसी देने का प्रावधान है.


याचिका में तर्क दिया गया था कि फांसी को अब सजा-ए-मौत के तरीके के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए और घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने कहा कि दुनिया भर के कई देशों ने फांसी देने का तरीका पहले ही छोड़ दिया है.


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