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रायपुर, 8 नवंबर 2026। ETrendingIndia / युद्ध के दौरान जंगल, नदियां, मिट्टी और जैव विविधता नष्ट होती हैं, जिसका असर पीढ़ियों तक रहता है।

प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा और उनका असमान वितरण कई सशस्त्र संघर्षों को बढ़ावा देते हैं।.
पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली स्थायी शांति के आधार हैं।

मानव इतिहास में युद्धों के निशान हमेशा से उजड़े शहरों और विस्थापित इंसानों की चीखों के रूप में दर्ज रहे हैं, लेकिन इसके पीछे का सबसे बड़ा और मौन शिकार प्रकृति का संहार होता है। बारूदों और टैंकों की तबाही से जल, जंगल और जीवन का जो तानावाना ध्‍वस्‍त होता है, उसकी भरपाई पीढ़ियों तक संभव नहीं है।

युद्ध की विभीषिका केवल सैनिकों या नागरिकों की मौतों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इससे जंगल जलते हैं, जल स्रोत और नदियां प्रदूषित होती हैं, खेत बंजर हो जाते हैं और वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं।

तेल के कुओं, औद्योगिक इकाइयों और बिजली संयंत्रों पर हमलों से फैलने वाले जहरीले पदार्थ हवा, पानी और मिट्टी को वर्षों तक प्रभावित करते हैं। इसी गंभीर समस्या के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 5 नवंबर 2001 को प्रस्ताव के माध्यम से हर साल 6 नवंबर को ‘युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतरराष्ट्रीय दिवस’ मनाने की घोषणा की गई थी।

इसका मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि पर्यावरण की रक्षा मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्थायी शांति से सीधे जुड़ी हुई है।

युद्ध में प्रकृति बनती है खामोश शिकार

युद्ध के दौरान बमबारी, मिसाइल हमले, आगजनी और सैन्य वाहनों की आवाजाही से पर्यावरण को कई स्तरों पर नुकसान पहुंचता है। जंगलों में आग लगने और पेड़ों की कटाई से वन क्षेत्र घटता है। भारी वाहनों और विस्फोटों से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत प्रभावित होती है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों, तेल भंडारों और रासायनिक इकाइयों पर हमले से जहरीले पदार्थ आसपास के वातावरण में फैल सकते हैं। इसका असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। हवा और पानी के माध्यम से प्रदूषण दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच सकता है।

खेतों में विस्फोटक अवशेष और रासायनिक पदार्थ रह जाने से खेती प्रभावित होती है। इस तरह युद्ध की कीमत आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी पड़ती है।

जंगल, जलस्रोत और जैव विविधता पर असर

जंगल पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड सोखने, मिट्टी का कटाव रोकने और वन्य जीवों को आवास देने का काम करते हैं। युद्ध के दौरान बमबारी, अंधाधुंध कटाई और सैन्य गतिविधियों से यह पारिस्थितिकी तंत्र तहस-नहस हो जाता है, जिससे वन्य जीवों के प्रजनन, भोजन और प्रवास में गंभीर बाधा आती है।

इसके अलावा, जल स्रोतों पर भी इसका विनाशकारी असर पड़ता है। बांधों, जल शोधन संयंत्रों और पाइपलाइनों के नष्ट होने से पेयजल आपूर्ति ठप हो जाती है।

वहीं, तेल रिसाव और औद्योगिक रसायनों के फैलाव से नदियां, झीलें और समुद्री क्षेत्र जहरीले हो जाते हैं, जिससे जलीय जीवों के साथ-साथ पीने के पानी और खेती के लिए इन स्रोतों पर निर्भर रहने वाले समुदायों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।

मिट्टी, खेती और खाद्य सुरक्षा पर संकट

युद्ध के दौरान भारी सैन्य वाहनों की आवाजाही, बमों के विस्फोट और रासायनिक प्रदूषण से कृषि भूमि की गुणवत्ता खराब हो सकती है। खेतों और ग्रामीण इलाकों में बिछी बारूदी सुरंगें तथा बिना फटे गोला-बारूद युद्ध समाप्त होने के बाद भी जानलेवा खतरा बने रहते हैं। किसान खेतों तक नहीं पहुंच पाते और पशुओं को चराने में भी जोखिम रहता है। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

खेती बाधित होने से भोजन की उपलब्धता घट सकती है और प्रभावित आबादी को दूसरे क्षेत्रों पर निर्भर होना पड़ता है। इसलिए युद्ध के बाद केवल खेतों को फिर से जोतना पर्याप्त नहीं है; मिट्टी और पानी की सुरक्षा की जांच तथा विस्फोटक अवशेषों को हटाना भी जरूरी है।

प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा और संघर्ष का संबंध

युद्ध और पर्यावरण का रिश्ता केवल संघर्ष के दौरान होने वाली तबाही तक सीमित नहीं है, बल्कि कई संघर्षों में प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और अवैध दोहन भी अहम भूमिका निभाता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, पिछले छह दशकों में हुए आंतरिक संघर्षों में से कम से कम 40 प्रतिशत का संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है।

तेल, गैस, खनिज, लकड़ी, पानी और उपजाऊ जमीन जैसे संसाधनों की उपलब्धता या उनके असमान वितरण ने तनाव को और बढ़ाया है। इन संघर्षों में शांति समझौते के बाद भी हिंसा के दोबारा भड़कने का जोखिम अधिक रहता है। इसलिए, संसाधनों का न्यायपूर्ण और टिकाऊ प्रबंधन शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

युद्ध के बाद भी दशकों तक रहता है नुकसान

युद्ध समाप्त होने के बाद शहरों और बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण संभव है, लेकिन पर्यावरण की बहाली बेहद लंबी और कठिन प्रक्रिया है। मिट्टी और पानी से जहरीले पदार्थों को हटाने तथा जंगलों व जैव विविधता को पुनर्जीवित करने में वर्षों लग जाते हैं। कई बार नुकसान इतना गहरा होता है कि उसकी भरपाई असंभव हो जाती है।

इसके अलावा, बारूदी सुरंगें और बिना फटे गोला-बारूद आवाजाही, खेती और पुनर्वास में बड़ी बाधा बनते हैं, जबकि प्रदूषित पानी व मिट्टी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करते हैं।

सुरक्षा संकट के कारण वैज्ञानिकों के लिए नुकसान का आकलन करना भी कठिन होता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम सहयोग करता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून

युद्ध के दौरान पर्यावरण की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कानूनी प्रावधान किए गए हैं। वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पर्यावरणीय बदलाव की तकनीकों के सैन्य या अन्य शत्रुतापूर्ण उपयोग पर रोक लगाने वाली ENMOD संधि अपनाई, जो 5 अक्टूबर 1978 को लागू हुई।

यह ऐसी तकनीकों के शत्रुतापूर्ण इस्तेमाल को प्रतिबंधित करती है, जिनसे व्यापक, दीर्घकालिक या गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। वर्ष 1977 के जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल-I के अनुच्छेद 35(3) और 55 प्राकृतिक पर्यावरण को व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर नुकसान पहुंचाने वाले युद्ध तरीकों पर रोक लगाते हैं।

अनुच्छेद 55 आबादी के स्वास्थ्य और अस्तित्व को खतरे में डालने वाली पर्यावरणीय क्षति से बचाव पर जोर देता है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून सैन्य और नागरिक लक्ष्यों में अंतर करने तथा अत्यधिक नुकसान से बचने की बाध्यता भी तय करता है।

रोम संविधि के अनुच्छेद 8(2)(b)(iv) के तहत जानबूझकर ऐसा हमला करना युद्ध अपराध हो सकता है, जिससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति अपेक्षित सैन्य लाभ की तुलना में स्पष्ट रूप से अत्यधिक हो। हालांकि, हर पर्यावरणीय नुकसान युद्ध अपराध नहीं है; इसके लिए निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी होनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र की पहल और पर्यावरणीय शांति निर्माण

संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावर संरक्षण को संघर्ष रोकने, शांति स्थापना और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण से जोड़ने पर विशेष जोर दिया है।

वर्ष 2016 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा ने स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और टिकाऊ प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की भूमिका को स्वीकार किया था।

अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग (आईएलसी) के वे सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संज्ञान में लिया।

ये सिद्धांत युद्ध से पहले या दौरान और बाद में पर्यावरण रक्षा, बहाली, खतरनाक अवशेषों से निपटने तथा शांति प्रक्रिया में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करने के स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं।

महिलाओं, बच्चों और स्थानीय समुदायों पर असर

युद्ध के दौरान पर्यावरणीय संकट का सबसे गंभीर असर महिलाओं, बच्चों और स्थानीय समुदायों पर पड़ता है। स्वच्छ पानी, भोजन और सुरक्षित आवास की कमी उनके दैनिक जीवन को कठिन बना देती है।

विस्थापन के कारण उन्हें ऐसे क्षेत्रों में जाना पड़ता है जहां प्राकृतिक संसाधनों पर पहले से ही भारी दबाव होता है। विशेष तौर पर, जल स्रोतों के प्रदूषित होने से महिलाओं की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं, जो पानी जुटाने और परिवार का प्रबंधन करती हैं।

वहीं, दूषित पानी और खराब स्वच्छता बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनते हैं।

युद्ध के बाद प्रकृति की बहाली भी हो पुनर्निर्माण का हिस्सा

युद्ध के बाद का पुनर्निर्माण केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए। इसके लिए दूषित मिट्टी व पानी की जांच, बारूदी सुरंगों व बिना फटे गोला-बारूद को हटाना, जंगलों का पुनर्विकास और जैव विविधता की रक्षा करना बेहद जरूरी है।

प्रकृति की रक्षा ही स्थायी शांति का आधार

युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतरराष्ट्रीय दिवस हमें यह समझने का अवसर देता है कि प्रकृति की सुरक्षा मानव जीवन और वैश्विक शांति से सीधे जुड़ी हुई है।

युद्ध में नष्ट हुए जंगल, दूषित नदियां, बंजर खेत और प्रदूषित हवा केवल पर्यावरण की समस्या नहीं हैं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, भोजन, पानी और आजीविका का संकट भी हैं। इसलिए युद्ध के दौरान पर्यावरण की रक्षा करना, प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग करना और संघर्ष के बाद प्रभावित क्षेत्रों की बहाली करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। सरकारों, सैन्य संस्थाओं, संयुक्त राष्ट्र, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों को मिलकर ऐसे प्रयास करने होंगे, जिनसे प्रकृति को होने वाला नुकसान कम किया जा सके। शांति का अर्थ केवल हथियारों का शांत होना नहीं, बल्कि जीवन को सहारा देने वाली प्रकृति का सुरक्षित रहना भी है। जब जंगल, जल स्रोत, मिट्टी और जैव विविधता सुरक्षित रहेंगे, तभी युद्ध प्रभावित समाजों का पुनर्निर्माण मजबूत आधार पर हो सकेगा। यही इस अंतरराष्ट्रीय दिवस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।


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