ICAR and FCIICAR and FCI
Share This Article

रायपुर , 02अक्टूबर 2026 / ETrendingIndia / भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने गेहूं और चावल में भंडारण के दौरान लगने वाले कीटों के सुरक्षित और टिकाऊ नियंत्रण के लिए वैकल्पिक धूम्रीकरण तकनीकों पर शोध के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता 30 सितंबर 2026 को हुआ।

इस शोध परियोजना को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) का समर्थन प्राप्त है। परियोजना का पहला चरण दो साल का होगा और इसे ICAR-केंद्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (CIPHET), लुधियाना द्वारा लागू किया जाएगा।

भारत में दशकों से अनाज के भंडार में कीट नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से एल्युमिनियम फॉस्फाइड (ALP) और मैलाथियान का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इनके लगातार और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से कीटों में प्रतिरोध बढ़ने की समस्या सामने आई है। कुछ प्रमुख राज्यों में कीट प्रतिरोध की दर 72 से 100 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे धूम्रीकरण की प्रक्रिया बार-बार करनी पड़ती है और संचालन लागत भी बढ़ती है।

मौजूदा रासायनिक तरीकों से कर्मचारियों के लिए सांस से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम और लंबे समय में पर्यावरण पर असर भी हो सकता है। नई पहल का उद्देश्य इन चुनौतियों से निपटने के लिए नाइट्रोजन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और कार्बन डाइऑक्साइड तथा फॉस्फीन के संयुक्त इस्तेमाल को वैज्ञानिक तरीके से विकसित करना है।

परियोजना के पहले चरण में तीन प्रमुख परीक्षण किए जाएंगे। इनमें धातु के साइलो में रखे गेहूं में भंडारण कीटों के नियंत्रण के लिए 99 प्रतिशत से अधिक शुद्धता वाली नाइट्रोजन गैस का इस्तेमाल शामिल है।

दूसरे परीक्षण में FCI और केंद्रीय भंडारण निगम (CWC) के गोदामों में बोरियों में रखे गेहूं और चावल के भंडारण कीटों के नियंत्रण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन गैस के संयुक्त इस्तेमाल का परीक्षण किया जाएगा।

तीसरे परीक्षण में एयरटाइट आवरण में रखी गेहूं और चावल की बोरियों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड से धूम्रीकरण की प्रभावशीलता का अध्ययन किया जाएगा।

दो साल के पहले चरण के परीक्षण के बाद दूसरे चरण में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में एक साल तक कई स्थानों पर परीक्षण किए जाएंगे। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) तैयार करना होगा।

इस पहल का लक्ष्य पारंपरिक रासायनिक धूम्रीकरण के ऐसे विकल्प विकसित करना है, जिन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जा सके और बड़े स्तर पर लागू किया जा सके। इससे कीटों में बढ़ते प्रतिरोध, कर्मचारियों के रासायनिक संपर्क, पर्यावरणीय प्रभाव और धूम्रीकरण के बाद बचे रसायनों से जुड़ी चिंताओं को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

समझौता ICAR के सचिव एवं महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट की मौजूदगी में हुआ। MoU पर ICAR-CIPHET के निदेशक डॉ. नचिकेत कोतवालीवाले और FCI के कार्यकारी निदेशक (गुणवत्ता नियंत्रण) डॉ. ए.के. सिन्हा ने हस्ताक्षर किए।


Share This Article