Share This Article रायपुर, 06 नवम्बर 2026/ ETrendingIndia / देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से जारी नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह विवादित नियमों पर नए सिरे से विचार कर रही है। इसके लिए सभी पहलुओं की समीक्षा करने और विशेष समिति गठित करने की प्रक्रिया पर भी काम किया जा रहा है। सरकार के इस रुख के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सरकार छात्रों की सभी चिंताओं का समग्र समाधान चाहती है। उन्होंने कहा कि नियमों की समीक्षा करते समय सभी वर्गों के हितों और उनकी आशंकाओं को ध्यान में रखा जाएगा। सरकार का उद्देश्य ऐसा समाधान निकालना है, जिससे किसी भी वर्ग के छात्र के मन में असंतोष, भय या असुरक्षा की भावना पैदा न हो। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि देश की नीतियां ऐसी होनी चाहिए, जिनसे हर युवा संतुष्ट और सुरक्षित महसूस करे। शिक्षण संस्थानों का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले सभी विद्यार्थियों को समानता का अनुभव हो। अदालत ने सरकार की दलीलों को अभिलेख पर लेते हुए अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की। यह मामला अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ और इससे जुड़ी अन्य याचिकाओं से संबंधित है। वर्ष 2019 में रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दोनों विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थानों में कथित जातिगत उत्पीडऩ और भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। याचिका में विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में वंचित वर्गों के विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियम बनाने की मांग की गई थी। इसी कानूनी प्रक्रिया और लंबे विचार-विमर्श के बाद यूजीसी ने जनवरी 2026 में नए नियमों की अधिसूचना जारी की थी। यूजीसी के नए नियम लागू होने के बाद इनके प्रावधानों को लेकर विवाद शुरू हो गया। सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों ने नियमों पर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। इसके बाद 29 जनवरी को शीर्ष अदालत ने इन नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने निर्देश दिया था कि मामले का अंतिम समाधान निकलने तक वर्ष 2012 के पुराने दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। याचिकाकर्ताओं की प्रमुख आपत्ति नियमों के प्रावधान 3(1)(सी) के तहत जातिगत भेदभाव की निर्धारित परिभाषा को लेकर थी। उनका तर्क था कि नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा के दायरे में केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को शामिल किया गया है। इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के हितों की अनदेखी हो सकती है। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि इस व्यवस्था के कारण गैर-आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की स्थिति बन सकती है और झूठी शिकायतों की संभावना भी बनी रह सकती है। वहीं, नियमों के समर्थन में दूसरे पक्ष का तर्क है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे समय से चली आ रही सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को विशेष संरक्षण देना आवश्यक है। अब केंद्र सरकार की ओर से नियमों की नए सिरे से समीक्षा और विशेष समिति गठित करने के संकेत मिलने के बाद इस विवाद के समाधान की उम्मीद बढ़ी है। माना जा रहा है कि सरकार सभी पक्षों की चिंताओं और विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसा रास्ता तलाशने का प्रयास करेगी, जिससे शिक्षण संस्थानों में समानता, सुरक्षा और भेदभावमुक्त वातावरण सुनिश्चित किया जा सके। Share This Article Post navigation केंद्र सरकार ने पासपोर्ट-वीजा नियमों में दी बड़ी राहत, शरणार्थियों और प्रवासियों को मिलेगा लाभ भारतीय नौसेना : INS तरकश ने मॉरीशस के पोर्ट लुइस का अपना दौरा सफलतापूर्वक पूरा किया…