CG News: Once the sound of gunfire echoed here; now, school bells ring. Over 600 schools in Bastar are bustling with life again—a new picture emerges on Teachers' Day.CG News
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रायपुर, 04 सितंबर। CG News : छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित इलाकों में इस शिक्षक दिवस पर बदलाव की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो कभी गोलियों और बारूद के साए में रहने वाले बस्तर के लिए नई उम्मीद का संकेत है। जिन गांवों में लंबे समय तक स्कूल बंद रहे, वहां अब दोबारा स्कूल की घंटियां गूंज रही हैं और बच्चे राष्ट्रगान के साथ पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं। करीब दो से ढाई दशकों तक बंद रहे 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को फिर से संचालित किया गया है।

20-25 साल बाद फिर खुले स्कूल, लौट आई बच्चों की चहल-पहल

दक्षिण बस्तर के बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे नक्सल प्रभावित जिलों के कई दूरस्थ इलाकों में लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था प्रभावित रही थी। सुरक्षा कारणों और नक्सली गतिविधियों के चलते कई स्कूल वर्षों तक बंद पड़े रहे। अब प्रशासन और सुरक्षा बलों के सहयोग से इन स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है।

कई ऐसे स्कूल भवन भी हैं, जिन्हें नक्सलियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था या जो लंबे समय तक सुरक्षा बलों के कैंप के रूप में इस्तेमाल हुए। इन भवनों को दोबारा तैयार कर बच्चों के अनुकूल बनाया जा रहा है। गांवों में स्कूल खुलने के साथ बच्चों की पढ़ाई और नियमित उपस्थिति का माहौल भी वापस लौट रहा है।

स्थानीय शिक्षकों ने संभाली शिक्षा की कमान

इन इलाकों में शिक्षा की वापसी के पीछे स्थानीय शिक्षकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। कठिन परिस्थितियों और दुर्गम रास्तों के बावजूद शिक्षक लगातार बच्चों तक पहुंच रहे हैं और उन्हें स्कूल से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

स्थानीय भाषा की चुनौती को देखते हुए शिक्षक गोंडी, हल्बी और डोरली जैसी बोलियों में बच्चों से संवाद कर रहे हैं। इससे बच्चों के बीच झिझक कम हुई है और उनका स्कूल के प्रति जुड़ाव बढ़ा है। शिक्षकों ने ग्रामीणों और अभिभावकों से लगातार संवाद कर उनका भरोसा भी हासिल किया है।

जहां स्कूल भवन टूटे, वहां बांस-तिरपाल के छप्पर में पढ़ाई

बस्तर के बीजापुर के पीड़िया, गंपूर, तमोड़ी और सुकमा के कई अंदरूनी क्षेत्रों में वर्षों से बंद स्कूलों को फिर शुरू किया गया है। कुछ स्थानों पर नक्सली हिंसा में स्कूल भवनों को नुकसान पहुंचने के कारण ग्रामीणों ने प्रशासन के सहयोग से बांस और तिरपाल से अस्थायी कक्षाएं तैयार की हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई दोबारा बाधित न हो।

स्थानीय शिक्षित युवाओं को ‘शिक्षा दूत’ के रूप में जोड़ा गया है। ये युवा बच्चों के साथ स्थानीय भाषा में संवाद करते हुए उन्हें पढ़ाई से जोड़ने और स्कूल आने के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

स्मार्ट क्लास, टैबलेट और खेलकूद से बदल रहा पढ़ाई का तरीका

दोबारा संचालित स्कूलों में केवल पारंपरिक तरीके से पढ़ाई पर जोर नहीं दिया जा रहा है। कई वनांचल क्षेत्रों में बच्चों को डिजिटल कंटेंट और टैबलेट के माध्यम से पढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है। इससे दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को भी आधुनिक शिक्षा संसाधनों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

स्कूलों में खेल सामग्री उपलब्ध कराने के साथ मध्याह्न भोजन और न्योता भोजन जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इन प्रयासों से बच्चों की स्कूल में रुचि और उपस्थिति बढ़ाने में मदद मिल रही है।

गोलियों की जगह किताबों की आवाज, शिक्षक दिवस पर बस्तर की नई कहानी

छत्तीसगढ़ में इस बार शिक्षक दिवस उन शिक्षकों और शिक्षा दूतों के समर्पण को रेखांकित कर रहा है, जो कठिन और दुर्गम इलाकों में बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने का काम कर रहे हैं। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ शिक्षक अब पहले की तुलना में अधिक भरोसे के साथ स्कूल पहुंच पा रहे हैं।

बस्तर के उन गांवों में दोबारा बजती स्कूल की घंटी सिर्फ पढ़ाई की शुरुआत नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और विकास की वापसी का प्रतीक बन रही है। जहां कभी बंदूक का डर बच्चों की शिक्षा पर भारी पड़ता था, वहां अब किताब, कलम और स्कूल की आवाज नई पीढ़ी के भविष्य की तस्वीर बदल रही है।


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