Share This Article नई दिल्ली, 04 सितंबर। India GDP : भारत की GDP ग्रोथ को लेकर चल रही बहस के बीच अब दिग्गज निवेशक शंकर शर्मा की टिप्पणी ने चर्चा को और तेज कर दिया है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग द्वारा अप्रैल-जून तिमाही की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ के आंकड़े पर सवाल उठाए जाने के बाद अब शंकर शर्मा ने भारत की आर्थिक वृद्धि और आम लोगों की जमीनी स्थिति के बीच अंतर का मुद्दा उठाया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि उन्हें GDP बढ़ोतरी के आंकड़ों की बहस में पड़ने में दिलचस्पी नहीं है, बल्कि वह यह बताना चाहते हैं कि देश में आर्थिक विकास का ‘रियल फील’ कैसा है। शंकर शर्मा बोले- कागज पर 7% से ज्यादा, लेकिन ‘रियल फील’ 2-3% शंकर शर्मा के मुताबिक, कागजों पर भारत करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है और 7 फीसदी से अधिक की रफ्तार से बढ़ रहा है। हालांकि, उनका दावा है कि आम जनता को इसका असर जमीन पर उतना दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि लोगों को वास्तविक रूप से GDP ग्रोथ महज 2-3 फीसदी के आसपास महसूस होती है। उन्होंने इसके पीछे देश में जीवन की गुणवत्ता से जुड़े पहलुओं का हवाला दिया। शर्मा के अनुसार, लोगों में तनाव बढ़ता दिखाई देता है, शहरों में ट्रैफिक और अव्यवस्था की समस्या बनी हुई है तथा बुनियादी शहरी सुविधाओं की स्थिति उस आर्थिक आकार के अनुरूप नहीं दिखती, जिसका दावा GDP के आंकड़े करते हैं। ‘4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था जैसी नहीं दिखती तस्वीर’ शंकर शर्मा ने भारत की आर्थिक स्थिति और जमीनी तस्वीर के बीच अंतर पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के कई शहर और गांव अब भी देखने में छोटी अर्थव्यवस्था जैसे नजर आते हैं। उनके मुताबिक, यदि भारत वास्तव में 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है और तेज गति से बढ़ रहा है, तो इसका असर लोगों के जीवन स्तर और सार्वजनिक सुविधाओं में भी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए। यह टिप्पणी GDP के आधिकारिक आंकड़ों पर सीधे तौर पर कोई वैकल्पिक आर्थिक गणना पेश नहीं करती, बल्कि आर्थिक विकास को लोगों के अनुभव और जीवन की गुणवत्ता के नजरिए से देखने की बात करती है। यूरोप से की भारत की तुलना, कहा- वहां ‘रियल फील’ ज्यादा शंकर शर्मा ने भारत की तुलना यूरोप से करते हुए कहा कि वहां आधिकारिक GDP ग्रोथ भले ही 2-3 फीसदी के आसपास हो, लेकिन उन्हें वहां आर्थिक समृद्धि का ‘रियल फील’ कहीं अधिक नजर आता है। उन्होंने साफ-सफाई, बेहतर व्यवस्था, लोगों की जीवनशैली और कैफे-रेस्टोरेंट में दिखाई देने वाली गतिविधियों का उदाहरण दिया। उनका तर्क है कि GDP सिर्फ आर्थिक उत्पादन को मापने वाला आंकड़ा है, जबकि किसी देश की वास्तविक समृद्धि को समझने के लिए जीवन की गुणवत्ता, सार्वजनिक व्यवस्था और लोगों के अनुभव जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए। सुभाष गर्ग के बयान से पहले ही गरम है GDP विवाद भारत की GDP को लेकर यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने अप्रैल-जून तिमाही की 7.8 फीसदी वृद्धि दर के आंकड़े पर सवाल उठाया है। गर्ग का कहना है कि अलग तरीके से गणना करने पर वास्तविक वृद्धि दर काफी कम हो सकती है। दूसरी ओर, सरकार और आधिकारिक पक्ष का कहना है कि GDP की नई सीरीज और आधार वर्ष में बदलाव के कारण पुराने और नए आंकड़ों की तुलना को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है। ऐसे में शंकर शर्मा की टिप्पणी ने बहस को एक अलग आयाम दे दिया है। जहां एक तरफ GDP के आंकड़ों और उनकी गणना पद्धति पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी उठ रहा है कि तेज GDP ग्रोथ का फायदा आम आदमी के जीवन में कितना दिखाई दे रहा है। GDP आंकड़ों से आगे ‘जमीनी विकास’ पर बहस GDP किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन को मापता है, लेकिन यह अकेले जीवन की गुणवत्ता का पूरा आकलन नहीं करता। यही वजह है कि शंकर शर्मा की टिप्पणी के बाद बहस सिर्फ GDP ग्रोथ रेट तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब आर्थिक विकास बनाम जमीनी खुशहाली का मुद्दा भी चर्चा में है। Share This Article Post navigation भारत ने रत्न एवं आभूषण निर्यात के लिए 100 अरब डॉलर का लक्ष्य रखा