॥ तय कर लो ॥
धर्म-अधर्म के युद्ध में
किसके साथ खड़े हो,
तय कर लो,
सदियों से क्यों खामोश पड़े हो।
लहू की कुछ बूँदें
इस मिट्टी में तुम्हारी भी दफ़्न हैं,
कफ़न से ख़ुद को न ढको,
फैलने दो विचारों की रोशनी।
क्या पता कब शाम ढल जाए,
उजाले को तेरी लालच खा जाए,
अँधेरा भी बुरा नहीं होता,
हर जन्म लगाता उसमें गोता।
तय कर लो,
सदियों से क्यों खामोश पड़े हो।
नदी इसलिए पवित्र नहीं
कि वह निर्मल बहती है,
वह इसलिए पवित्र है
कि अपना मार्ग स्वयं गढ़ती है।
धर्म किसी ध्वज का नाम नहीं,
धर्म तो जागृत विवेक है,
उठो,
अपने होने का साक्ष्य दो,
समय की अदालत में
मौन भी अपराध है।
तय कर लो, सदियों से क्यों खामोश पड़े हो।
रायपुर, 07 जून 2026/ ETrendingIndia /
मनोज मौर्य, मुंबई

रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है….
