Share This Article अंधेरे की काल-कोठरी में,कब तक साये से बतियाओगे ?खयाली दीवारों पर तुम,कब तक माथा टकराओगे ? भ्रम तोड़ो! वह परछाई नहीं,वह कायरता का डेरा है।उजाला अभी दूर सही,पर चीखों ने तुम्हें घेरा है। सुनो!वह सिसकी नहीं, वह क्रांति की पहली आहट है,सत्ता के गलियारों में, उठती एक गड़गड़ाहट है।जो चुप बैठे हैं डर के मारे, तुम उनकी आवाज़ बनो,ज़िंदा हो तो, जीने का अंदाज़ बनो। मृत्यु से क्या डरना ?वह तो अंत नहीं, वह सबसे बड़ी ‘मुक्ति’ है,कायरों के लिए आपदा, वीरों के लिए ‘शक्ति’ है। जब देह की सीमा टूटेगी, तब विचार अमर हो जाएगा,तेरा लहू ही मिट्टी में, इंक़लाब बो जाएगा। उठो! कि लहू में उबाल अभी बाकी है,अन्याय के सीने में, एक सवाल अभी बाकी है। जब तक फेफड़ों में हवा, और नसों में रवानी है,लड़ो! कि अभी लिखी जानी, तुम्हारी शौर्य-कहानी है। चेतना का उदय कविता रायपुर, 15 मई 2026/ ETrendingIndia / मनोज मौर्य, मुंबई रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है…. Share This Article Post navigation ज्ञान भारतम् मिशन : ग्राम निनवा में 136 वर्ष प्राचीन श्रीमद्भागवत महापुराण एवं हस्तलिखित पांडुलिपियाँ प्राप्त स्मृति पुस्तकालय योजना : 12,500 पुस्तकें दान , आपभी ज्ञान के दान में बनें भागीदार