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कृष्ण को भजते हो,
और अधर्म को धर्म बताते हो।

कंस-वध का जयगान करते हो,
पर हर अत्याचार के आगे
मौन हो जाते हो।

गीता की हर पंक्ति दोहराते हो,
पर अपने लिए
अशिक्षित समाज बनाते हो।

द्रौपदी के लिए
कृष्ण को पुकारते हो,
और स्त्री का सम्मान लुटता देख नज़रें फेर जाते हो।

मंदिरों में दीप जलाते हो,
पर अपने ही मन के अँधेरे से
डर जाते हो।

बाँसुरी की धुन सुनते हो,
पर करुणा की पुकार
नहीं सुन पाते हो।

सुदामा की मित्रता गाते हो,
पर किसी भूखे हाथ में
अन्न नहीं रख पाते हो।

गोवर्धन उठाने वाले को पूजते हो,
पर एक सत्य का भार
उठाने से काँप जाते हो।

कहते हो,
“यदा यदा हि धर्मस्य…”
पर जब धर्म
तुम्हारे सामने खड़ा होता है,
तुम सुविधा के पक्ष में खड़े हो जाते हो।

कृष्ण केवल मूर्ति नहीं,
जागृत विवेक हैं।

गीता केवल ग्रंथ नहीं,
भय पर विजय का घोष है।

धर्म पूजा से नहीं,
सत्य के पक्ष में लिए गए
निर्णय से जन्म लेता है।

और अधर्म
युद्धभूमि में नहीं,
उस क्षण जन्म लेता है
जब मनुष्य
सत्य पहचानकर भी
मौन चुन लेता है।

इसलिए
कृष्ण को मत खोजो।
अपने भीतर के अर्जुन को जगाओ।

क्योंकि हर युग में
कृष्ण जन्म नहीं लेते,
पर हर युग में
एक कुरुक्षेत्र अवश्य जन्म लेता है।

प्रश्न वही रहता है…

तुम्हारे हाथ में शस्त्र है,
या केवल शास्त्र… ?

रायपुर, 20 जुलाई 2026/ ETrendingIndia /

रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है….