In Service of India
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लेखक – डॉ. जितेंद्र सिंह ( केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार भारत सरकार)

रायपुर 10 जून 2026/ ETrendingIndia / “In Service of India: 12 Years of Science and Technology” जब जम्मू के डोडा जिले की एक लैवेंडर किसान मौसम के पहले फूल तोड़ती है, तब वह विज्ञान नीति के बारे में नहीं सोचती। लेकिन सच यह है कि केंद्र शासित प्रदेश की बंजर पहाड़ियों को बैंगनी फूलों की सुगंधित खेती में बदलने के पीछे पिछले एक दशक में किया गया उद्देश्यपूर्ण और दूरदर्शी वैज्ञानिक निवेश ही है।

यह ग्रामीण आजीविका में आई ऐसी क्रांति है, जिसकी शुरुआत एक प्रयोगशाला से हुई थी।

असल में, भारत में पिछले बारह वर्षों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का यही अर्थ है। विज्ञान केवल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन को बेहतर बनाने वाली एक जीवंत और प्रभावशाली शक्ति बन गया है।

विज्ञान – राष्ट्र निर्माण का मिशन

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तब उन्होंने एक ऐसी सोच प्रस्तुत की जिसमें विज्ञान को केवल किसी विभाग का काम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मिशन माना गया।

इसके बाद के वर्षों में इस दृष्टि ने ऐसे परिणाम दिए, जो एक पीढ़ी पहले असाधारण माने जाते।

भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतारा

आज भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतार चुका है, पहली बार अपनी स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित कर चुका है, पुणे से पटना तक सुपरकंप्यूटर स्थापित कर चुका है और एक ऐसे अंतरिक्ष अर्थतंत्र का निर्माण कर चुका है जिसमें देशी स्टार्टअप्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन इन उपलब्धियों की असली कहानी यह नहीं है कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि इन उपलब्धियों ने आम नागरिकों के जीवन को किस तरह प्रभावित किया।

विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विकास और नागरिक सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन चुका है।

मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार

किसानों का उदाहरण लें। भारतीय कृषि में मौसम हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। पिछले एक दशक में पृथ्वी अवलोकन (अर्थ ऑब्जर्वेशन) और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप आज किसानों को सटीक और स्थानीय स्तर पर मौसम की जानकारी मिल रही है।

यह केवल संभावनाओं पर आधारित अनुमान नहीं, बल्कि इतनी सटीक जानकारी है कि कोई किसान परिवार यह तय कर सकता है कि फसल आज काटनी है या कल तक इंतजार करना है।

मौसम – कई दिन पहले ही सचेत

आज यदि बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनता है, तो हमारी आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां तटीय समुदायों को कई घंटे, और कई बार कई दिन पहले ही सचेत कर देती हैं। इसका महत्व केवल आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता; इसका वास्तविक मूल्य उन अनगिनत जानों और आजीविकाओं में दिखाई देता है जो समय रहते बचाई जा रही हैं।

“अरोमा मिशन”

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों और नदी घाटियों में विज्ञान ने “अरोमा मिशन” के रूप में दस्तक दी। इस कार्यक्रम के तहत किसानों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा गया तथा उन्हें तकनीक, बेहतर बीज और बाज़ार तक पहुँच उपलब्ध कराई गई। जो पहल एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी, वह आज भारत की “पर्पल रिवोल्यूशन” (बैंगनी क्रांति) के रूप में जानी जाती है। इसके माध्यम से हजारों किसान परिवार सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं।

भारत में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत

इसी प्रकार के प्रयासों के तहत केसर की खेती का विस्तार, औषधीय जड़ी-बूटियों का उत्पादन और भारत में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत की गई।

3 डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल

विज्ञान के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा है। किफायती ग्रामीण आवास के लिए विकसित 3डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल से लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट की पहचान करने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों तक, तकनीक को उन समस्याओं के समाधान के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सामना समाज के सबसे कमजोर वर्ग करते हैं।

25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब

देशभर में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों ने एक हजार से अधिक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया है, जो सटीक कृषि, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर काम कर रहे हैं।

जैव प्रौद्योगिकी की नई क्रांति

यदि कोई क्षेत्र भारतीय विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को सबसे प्रभावशाली ढंग से दिखाता है, तो वह जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र है। दशकों तक भारत की फार्मास्युटिकल ताकत मुख्य रूप से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) तक सीमित रही। हम उन दवाओं के जेनेरिक संस्करण बनाते थे, जिनकी खोज दूसरे देशों में होती थी। अब यह कहानी बदल रही है।

स्वदेशी एंटीबायोटिक

दशकों में पहली बार भारत में खोजी गई स्वदेशी एंटीबायोटिक “नैफिथ्रोमाइसिन” का विकास केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा भी है।

यह दवा इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्रयोगशालाएँ अब केवल दवाएँ बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं की खोज और विकास के वैश्विक अग्रिम मोर्चे पर भी काम कर सकती हैं। यह वह क्षमता है जो दुनिया के केवल कुछ देशों के पास ही है।

स्वदेशी जीन थेरेपी क्लीनिकल ट्रायल

इसी तरह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में हीमोफीलिया के लिए पहली सफल स्वदेशी जीन थेरेपी क्लीनिकल ट्रायल रही, जिसे वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में सम्पन्न किया गया।

जीन थेरेपी की विशेषता यह है कि यह बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल आनुवंशिक दोष को ठीक करने का प्रयास करती है।

“जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट”

इसके साथ-साथ “जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट” के तहत भारत की विविध आबादी से जुड़े 10,000 से अधिक मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। इससे देश में ऐसी वैज्ञानिक नींव तैयार हो रही है, जिसके आधार पर भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति की जैविक संरचना के अनुसार व्यक्तिगत और अधिक प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए जा सकेंगे।

दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल बीमारियों का इलाज करने की दिशा में ही नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत चिकित्सा” के उस युग की ओर बढ़ रहा है, जहां उपचार हर मरीज की आनुवंशिक विशेषताओं के अनुरूप होगा।

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घरेलू जैव-चिकित्सा (बायोमेडिकल) क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत की प्रतिक्रिया, अपने स्वयं के टीकों का विकास करना, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और 1.4 अरब लोगों तक उन्हें पहुंचाना, हमारे जैव प्रौद्योगिकी तंत्र में वर्षों से किए गए निवेश का परिणाम थी।

इस सफलता के पीछे बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल(बीआईआरएसी) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

आज भारत में जैव-उद्यमियों की एक नई पीढ़ी उभर रही है, जो प्रिसिजन मेडिसिन, टिकाऊ जैव-आधारित सामग्री और अगली पीढ़ी की डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम कर रही है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नवाचार केवल अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से भी उभर रहा है।

सितारों तक पहुंच, नागरिकों से जुड़ाव

23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर अपने अंतिम चरण में उतर रहा था, एक ऐसा क्षेत्र जहां इससे पहले कोई देश नहीं पहुँच पाया था, तब करोड़ों भारतीयों की निगाहें उस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं।

लैंडिंग का वह पल केवल तकनीकी सफलता नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। भारत ने वह कर दिखाया था जो दुनिया का कोई अन्य देश नहीं कर सका था।

इसके बाद चंद्रमा की सतह से प्राप्त जानकारियाँ और लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर से पृथ्वी पर भेजा गया वैज्ञानिक डेटा निस्संदेह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

आदित्य-एल1 – सूर्य का अध्ययन

जहाँ चंद्रयान-3 ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आदित्य-एल1 ने चुपचाप सूर्य का अध्ययन करने का अपना मिशन शुरू किया। यह मिशन अंतरिक्ष मौसम को समझने में मदद कर रहा है, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, बिजली ग्रिडों और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।

इसी क्रम में स्पेडेक्स मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल कर दिया, जिन्होंने अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक जोड़ने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशनों और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर ऐतिहासिक प्रवास

वहीं शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का ऐतिहासिक प्रवास भारत के मानव अंतरिक्ष मिशन के सपनों को वास्तविकता के और करीब ले आया।

वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण और ग्राउंड सिस्टम सहित पूरे अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया।

स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 400 से अधिक

इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, वहीं आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप्स रॉकेट बना रहे हैं, उपग्रह डिजाइन कर रहे हैं और कृषि निगरानी से लेकर आपदा प्रबंधन तक अनेक क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान विकसित कर रहे हैं।

2014 के बाद से भारतीय प्रक्षेपण यानों ने 399 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसके चलते भारत दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों और देशों के लिए एक विश्वसनीय एवं पसंदीदा साझेदार बनकर उभरा है।

निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी ने नवाचार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।

2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित

आने वाले वर्षों के लिए भारत की योजनाएँ और भी महत्वाकांक्षी हैं। वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है, जबकि वर्ष 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजने का लक्ष्य रखा गया है।

हमारी महत्वाकांक्षा दीर्घकालिक है, दृष्टि स्पष्ट है और दिशा लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रही है।

नवाचार से आत्मनिर्भरता

“आत्मनिर्भर भारत” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह एक मार्गदर्शक दर्शन बन चुका है। 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ शुरू किया गया राष्ट्रीय क्वांटम मिशन केवल एक नई तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास है।

क्वांटम कंप्यूटिंग ऐसी जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती है जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटर हल नहीं कर सकते। क्वांटम संचार लगभग अभेद्य साइबर सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि क्वांटम सेंसिंग नेविगेशन, चिकित्सा इमेजिंग और भू-वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।

सुपरकंप्यूटिंग मिशन

इसी तरह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत पुणे, चेन्नई, खड़गपुर और अन्य शहरों में उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग की सुविधाएं विकसित की गई हैं।

” भारतजेन” – बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। “भारतजेन”, देश का पहला सरकारी वित्तपोषित बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम, ऐसे बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहा है जो भारतीय भाषाओं में सोच और संवाद कर सकें।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लाभ केवल अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के हर नागरिक तक पहुँचें।

इस आत्मनिर्भरता की दृष्टि को साकार करने में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च(सीएसआईआर) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान

भारतीय इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार किया गया है। यह भारत की विमानन तकनीक में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत

इसी प्रकार भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत स्वच्छ समुद्री परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स, देश की अपनी तरह की पहली सुविधा, ऐसी प्रयोगशाला के रूप में विकसित की गई है जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्यमशीलता का संगम होता है।

ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तकनीकें

अप्रैल 2026 में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की पहली क्रिटिकलिटी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह रिएक्टर पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया है।

इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम भंडार का ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग करना है।

भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल को इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी से “रेज ऑफ होप एंकर सेंटर ” के रूप में मान्यता मिलना भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान है।

रेडियोफार्मास्यूटिकल्स ऐसी विशेष दवाएँ होती हैं जिनमें रेडियोधर्मी कणों का उपयोग कैंसर की पहचान और उपचार के लिए किया जाता है। इससे मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी चिकित्सा मिल पाती है।

वर्ष 2025 का शांति अधिनियम भी परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है।

” डीप ओशन मिशन”

दूसरी ओर, भारत का “डीप ओशन मिशन”पृथ्वी के अंतिम बड़े अनछुए क्षेत्र-गहरे समुद्र तक देश की वैज्ञानिक पहुँच का विस्तार कर रहा है।

इसके साथ ही यह मिशन उन्नत पनडुब्बी वाहनों, सेंसर प्रणालियों और समुद्री अनुसंधान तकनीकों का भी विकास कर रहा है। इससे भारत को अपने समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक, आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु तकनीक और समुद्री विज्ञान में हो रहे ये निवेश केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विज्ञान ही भविष्य की दिशा

जब भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी केवल इस यात्रा का सहायक साधन नहीं होंगे, बल्कि वे इसकी गति और स्वरूप दोनों निर्धारित करेंगे।

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन भारत के शोध एवं नवाचार तंत्र को नई दिशा देने के लिए किया गया है।

” रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड

इसका उद्देश्य मिशन-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग को मजबूत करना तथा युवा शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। इसके साथ ही एक लाख करोड़ रुपये की पूंजी वाले नए “रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड” की स्थापना भारत द्वारा अपनी बौद्धिक क्षमता पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है।

विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और वैज्ञानिक सोच के आधार पर विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाए।