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क्या तुम अँधकार में देख सकते हो?
“हाँ…”
थियो ने देखा था
प्रकाश का पहला बीज।

वह मिट्टी बना उस वृक्ष की,
जिसे उगते किसी ने नहीं देखा।

क्योंकि बीज हमेशा
अँधेरे की गोद में
अंकुरित होते हैं।

थियो का विश्वास
सूरजमुखी बनकर खिला,
और उसका पसीना
आलू खाने वालों की आँखों में
भूख का रंग भर गया।

विन्सेंट रंग नहीं बनाता था,
वह थियो के विश्वास का
दृश्य रचता था।

एक ने रंगों को जन्म दिया,
दूसरे ने उन रंगों पर
समय का पहरा दिया।

जब संसार ने कहा “यह पागल है”
थियो ने कहा “यह भविष्य है।”

कुछ संबंध शब्दों से नहीं,
प्रतीक्षा से लिखे जाते हैं।

थियो ने विन्सेंट को नहीं संभाला,
उसने बस
उसे गिरने की पूरी स्वतंत्रता दी…

और हर बार धरती बनकर
उसे थाम लिया।

विन्सेंट
थियो की ज़मीन पर उगा
वह फल है,

जिसका स्वाद
दुनिया आज भी कला कहकर चखती है।

हर महान चित्र के पीछे
एक अदृश्य हाथ होता है,
और हर प्रकाश के पीछे
कोई न कोई अँधकार में
चुपचाप जल रहा होता है।

-मनोज मौर्य
12 July 2026, Germany

रचयिता.. लगभग 20 वर्षों से माया नगरी मुंबई में फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, गीतकार, लेखक के रूप में स्थापित मनोज मौर्य किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आपने कई फिल्मों का निर्देशन किया है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित मनोज जी को फाइन आर्ट, पेंटिंग्स, पर्यटन आदि इत्यादि के शौक और घुमक्कड़ मिज़ाज ने इन्हें अनुभवों की खान बना दिया है। उनकी कविताएं अपने आप संवेदनशील हृदय के द्वार से जैसे हवा की मानिंद बहने लगती हैं। आज के माहौल की मनःस्थिति को बयां करती ये कविता उसी की एक बानगी है….