Rath Yatra Special: Shivrinarayan—the spiritual hub of Chhattisgarh's Rath Yatra... home to the unique heritage of the Jagannath tradition.
Rath Yatra Special
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प्रो. अश्विनी केशरवानी/ Rath Yatra Special: Shivrinarayan—the spiritual hub of Chhattisgarh’s Rath Yatra… home to the unique heritage of the Jagannath tradition.

Rath Yatra Special : छत्तीससगढ़ प्रदेश का अधिकांश भाग बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा से जुड़ा है। अतः इन सीमावर्ती क्षेत्रों में उन प्रदेशों की परम्पराएं देखने को मिलती है। वहां का खानपान, रहन सहन और बोल चाल भी प्रभावित होती है। ऐसी अनेक परम्पराएं छत्तीसगढ़ की पूर्वी सीमा जो उड़ीसा से जुड़ा है, में देखने को मिलती है। रथयात्रा उनमें से एक बहु प्रचलित परम्परा है।

शिवरीनारायण को कहा जाता है छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी

इसे उड़ीसा के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। उड़ीसा में प्रचलित है ‘‘..मोर गौरव जगन्नाथ’’ (जगन्नाथ जी हमारे गौरव हैं)। भगवान जगन्नाथ ही ऐसे देव हैं जो मंदिर से चलकर जनता के बीच आते हैं और उनका दुख दूर करते हैं।‘‘…सब मनिसा मोर परजा’’ (सब मनुष्य मेरी प्रजा है), ये उनके उद्गार है। भगवान जगन्नाथ तो पुरूषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है। उनके अनेक नाम है, वे पतित पावन हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की जनकपुर यात्रा रथ में बिठा कर करायी जाती है। जगन्नाथपुरी में तीनों को अलग अलग रथ में बिठाकर यात्रा कराया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में तीनों विग्रह मूर्तियों को एक ही रथ में बिठाकर निकाला जाता है। विशाल जनसमुदाय इस रथयात्रा का आनंद और पुण्य लाभ लेते हैं। नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से इस दिन मिलता है।

भगवान जगन्नाथ..विभिन्न धर्मो और मतों के भक्तों को समान रूप से दर्शन देकर तृप्त करते हैं। इस समय उनका व्यवहार सामान्य मनुष्यों जैसा होता है। जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है..उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन भी हैं और बुद्ध भी। अनेक कथाओं, विश्वासों और अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भूत समन्वय है।

तीनों देवों की एक ही रथ में निकलती यात्रा

जगन्नाथ मंदिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहां तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। यहां तांत्रिकों के प्रभाव के जीवंत साक्ष्य भी हैं। जिस प्रकार राजा-महाराजा, जमींदार, मालगुजार रत्नपुर की महामाया देवी और सम्बलपुर की समलेश्वरी देवी को अपने नगरों में ‘‘कुलदेवी’’ के रूप में प्रतिष्ठित किये हैं, वैसे ही जगन्नाथ धाम की यात्रा करके भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों को अपने नगरों में स्थापित कर पुण्य लाभ प्राप्त करते रहें हैं।

छत्तीसगढ़ प्रांत के जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत महानदी के तट पर स्थित शिवरीनारायण को भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान माना जाता है। आज भी यहां भगवान जगन्नाथ गुप्त रूप से विराजमान हैं जिसके कारण शिवरीनारायण को ‘‘गुप्तधाम’’ कहा जाता है। माघ पूर्णिमा को प्रतिवर्ष भगवान जगन्नाथ यहां विराजते हैं।
भगवान जगन्नाथ को शिवरीनारायण से ही पुरी ले जाया गया था ऐसी मान्यता है। उड़ीसा के अनेक शोधकत्र्ताओं ने अपने शोधपत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख भी किये हैं।

ऐसी मान्यता है कि माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ शिवरीनारायण में विराजमान होते हैं और इस दिन इनका दर्शन पुण्यदायी और मोक्षदायी होता है। शबरीनारायण के मठ परिसर में संवत् 1927 में महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से भटगांव के जमींदार श्री राजसिंह ने जगन्नाथ मंदिर की नींव डाली जिसे उनके पुत्र श्री चंदनसिंह ने पूरा कराया और उसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की विग्रह मूर्तियों की स्थापना करायी। संवत् 1927 में ही उन्होंने महंत अर्जुनदास जी की प्रेरणा से महानदी के तट पर योगियों के निवासार्थ एक भवन का निर्माण कराया। इसे ‘‘जोगीडीपा’’ कहते हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और तत्कालीन शबरीनारायण तहसील के तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तक ‘‘प्रलय’’ में लिखा हैः-‘‘जोगीडिपा श्री मान् बाबा गौतमदास जी का सुंदर बगीचा एक ऊँची भूमि पर जो किसी समय में एक पहाड़ी थी, है। बाबा जी यहां के महंत और प्रतिष्ठित हैं।’’ रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी यहां एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इस कारण इसे ‘‘जनकपुर’’ भी कहा जाता है।

रथयात्रा सामाजिक सद्भाव और लोक संस्कृति का प्रतीक

इसी प्रकार पंडित कौशलप्रसाद द्विवेदी के घर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्ति स्थापित है। पहले रथयात्रा में यहीं की मूर्तियों को रथ में निकाला जाता था। बाद में जब मठ की मूर्तियों को रथ में निकाला जाने लगा तब दो रथ में दोनों जगहों की मूर्तियां निकाली जाने लगी। आगे चलकर केवल मठ की मूर्तियां ही निकाली जाने लगी। यह परम्परा आज भी जारी है।

रथयात्रा यहां का एक प्रमुख त्योहार है। प्राचीन काल से यहां रथयात्रा का आयोजन मठ के द्वारा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार महंत गौतमदास ने यहां रथयात्रा की शुरूवात की और महंत लालदास ने उसे सुव्यवस्थित किया। मठ के मुख्तियार पंडित कौशलप्रसाद तिवारी को हमेशा स्मरण किया जायेगा।

वरीनारायण और आसपास के हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां आकर रथयात्रा में शामिल होकर और रथ खींचकर पुण्यलाभ के भागीदार होते हैं। जगह जगह रथ को रोककर पूजा-अर्चना की जाती है। प्रसाद के रूप में नारियल, लाई और गजामूंग दिया जाता है। मेला जैसा दृश्य होता है। सद्भाव के प्रतीक रथयात्रा आज भी यहां श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

कई शहरों में श्रद्धा और भक्ति के साथ निकलती है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा

शिवरीनारायण को ‘‘छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी’’ कहा जाता है। राजिम में भगवान साक्षी गोपाल विराजमान हैं और ऐसी मान्यता है कि शिवरीनारायण के बाद राजिम की यात्रा और भगवान साक्षी गोपाल का दर्शन करना आवश्यक है अन्यथा उनकी यात्रा अधूरा होता है। इसी लिए प्राचीन कवि श्री बटुसिंह शिवरीनारायण माहात्म्य में गाते हैं-

मास अषाढ़ रथ दुतीया, रथ के किया बयान।
दर्शन रथ को जो करे, पावे पद निर्वान ।।

छत्तीसगढ़ के अन्यान्य नगरों-सारंगढ़, रायगढ़, सक्ती, चाम्पा, नरियरा, रायपुर, राजिम, धमतरी, बिलासपुर, रतनपुर, बस्तर, जशपुर, धरमजयगढ़, और सरगुजा में भी जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा निकलती है। रायपुर में रथयात्रा दूधाधारी मठ से, बिलासपुर में वेंकटेश मंदिर से और अन्य स्थानों में जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा बड़े धूमधाम से निकलती है।

छत्तीसगढ़ में रथयात्रा की तिथि को बड़ा शुभ दिन माना जाता है। इस दिन कोई भी शुभ कार्य किया जाता है। बेटी बिदा और बहू को लिवा लाने की विशेष परम्परा है। बच्चे, बूढ़े सब नये कपड़े पहनकर रथयात्रा में सम्मिलित होते हैं। इस दिन नाते-रिश्तेदारों के घर मेवा-मिष्ठान भिजवाने की प्रथा है। यह लोक भावना से जुड़ी परंपरा है।

प्रो. अश्विनी केशरवानी
डागा कालोनी, बरपाली चैंक चाम्पा-495671 (छ.ग.)