Tirupati
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रायपुर 15 जून 2026/ ETrendingIndia / “In Tirupati, fuel, manure, and industrial products are being made from flowers, plastic, and waste.” आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित Sri Venkateswara University (एसवीयू) के वैज्ञानिकों ने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने प्लाज्मा पायरोलिसिस तकनीक पर आधारित एक विशेष प्रोटोटाइप मशीन विकसित की है, जिसकी मदद से विभिन्न प्रकार के कचरे को उपयोगी उत्पादों और ईंधन में बदला जा रहा है।

बिना प्रदूषण के कचरे का उपयोग
इस आधुनिक तकनीक की खासियत यह है कि गीले और ठोस कचरे का निपटान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना किया जा सकता है।

इससे कचरे की मात्रा कम होने के साथ-साथ उपयोगी उत्पाद भी प्राप्त हो रहे हैं।

मंदिर में चढ़ने वाले फूलों से खाद और सुगंधित उत्पाद

विश्व प्रसिद्ध Tirumala Venkateswara Temple में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में फूल चढ़ाए जाते हैं। इन फूलों को फेंकने के बजाय उनसे जैविक खाद और सुगंधित उत्पादों के निर्माण में उपयोग होने वाले रसायन तैयार किए जा रहे हैं। इससे मंदिर के कचरे का बेहतर प्रबंधन हो रहा है।

प्लास्टिक कचरे से तैयार हो रहा ईंधन

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को पिघलाकर औद्योगिक उपयोग के लिए ईंधन तेल तैयार करने में भी सफलता प्राप्त की है। यह ईंधन विभिन्न उद्योगों में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे प्लास्टिक प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।

नारियल के छिलकों से चारकोल और बायोफ्यूल

तिरुमला क्षेत्र में बड़ी संख्या में नारियल चढ़ाए जाते हैं। इनके छिलकों से सक्रिय चारकोल (एक्टिवेटेड चारकोल), बायोफ्यूल तथा अन्य उपयोगी उत्पाद बनाए जा रहे हैं। यह चारकोल पानी और हवा को शुद्ध करने में भी उपयोगी माना जाता है।

किसानों को मिलेगा लाभ

कचरे से तैयार की गई जैविक खाद का उपयोग आसपास के किसानों द्वारा किया जा सकेगा। इससे खेती की लागत कम होगी और पर्यावरण अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलेगा।

प्रतिदिन आते हैं एक लाख से अधिक श्रद्धालु

Tirumala Tirupati Devasthanams (टीटीडी) के अनुसार तिरुपति और तिरुमला में प्रतिदिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतनी बड़ी संख्या में आने वाले लोगों से उत्पन्न कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए यह पहल एक आदर्श मॉडल बनकर उभर रही है।

अन्य धार्मिक स्थलों के लिए बनेगा उदाहरण

विशेषज्ञों का मानना है कि कचरे को संसाधन में बदलने की यह तकनीक देश के अन्य बड़े मंदिरों, धार्मिक स्थलों और नगर निकायों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। इससे स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा उत्पादन तीनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल किया जा सकेगा।